ऑपरेशन कामयाब रहा, मगर मरीज़ मर गया : आधे-अधूरे न्याय पर उठते सवाल


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी

नई दिल्ली।देश की सर्वोच्च अदालत के हालिया और ऐतिहासिक फैसलों पर उठ रहे सवालों के बीच एक तीखी टिप्पणी चर्चा में है  “ऑपरेशन कामयाब रहा, मगर मरीज़ मर गया।”
यह टिप्पणी उन मामलों की ओर इशारा करती है जहाँ फैसले तो न्यायोचित प्रतीत हुए, मगर उनके परिणाम न्याय की आत्मा को संतुष्ट नहीं कर पाए।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व में आए कई अहम निर्णय अब इस बहस के केंद्र में हैं। आलोचकों का कहना है कि अदालत ने कई मामलों में सिद्धांतों की रक्षा तो की, पर न्याय की परिणति अधूरी छोड़ दी।
बाबरी विध्वंस मामला:
अदालत ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को अपराध करार दिया, परंतु अपराधियों को सज़ा नहीं दी। यह भारतीय न्यायिक इतिहास का ऐसा फैसला माना गया जिसमें “अपराध सिद्ध हुआ, पर अपराधी छूट गए।”
इलेक्टोरल बॉन्ड मामला:
सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक बताया, लेकिन उस योजना से अर्जित धन को राजनीतिक दलों के पास रहने दिया। आलोचकों के अनुसार यह “असंवैधानिकता की स्वीकारोक्ति, पर दंड का अभाव” है।
महाराष्ट्र सरकार विवाद:
अदालत ने राज्य में सत्ता परिवर्तन को अवैध करार दिया, पर उस “अवैध” सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करने दिया। इससे यह सवाल उठता है कि अगर व्यवस्था गलत थी, तो परिणाम वैध कैसे हुआ?
चंडीगढ़ मेयर चुनाव मामला:
न्यायालय ने पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह को “लोकतंत्र का लुटेरा” कहा, पर उनके खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई का आदेश नहीं दिया।
राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद फैसला:
कोर्ट ने कहा कि मस्जिद में मूर्तियाँ रखना और विध्वंस, दोनों गैरकानूनी थे, पर अंततः भूमि मंदिर पक्ष को सौंप दी। इस विरोधाभास को लेकर भी न्यायिक दृष्टिकोण पर सवाल खड़े हुए।
इन सब उदाहरणों को लेकर आलोचकों का कहना है कि कई फैसले “कानूनी रूप से तो सफल ऑपरेशन” साबित हुए, लेकिन “न्याय का मरीज़” मर गया।
कानून की किताब में जीत जरूर दर्ज हुई, मगर इंसाफ का चेहरा मायूस रह गया।

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