इस्लाम में रोज़े फ़र्ज़ क्यों किए गए और साइंस की नज़र में इसके हैरतअंगेज़ फ़ायदे क्या हैं
रिपोर्ट: मुस्तक़ीम मंसूरी
इस्लाम एक मुकम्मल ज़ाब्ता-ए-हयात (ज़िंदगी का पूरा उसूल) है, जो इंसान की रूह, जिस्म और मुआशरे (समाज)—तीनों की इस्लाह (सुधार) करता है।
इन्हीं तीनों को तवाज़ुन (संतुलन) में रखने के लिए अल्लाह तआला ने माह-ए-रमज़ान में रोज़े फ़र्ज़ किए।
रोज़ा सिर्फ़ भूखा या प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह इंसान की रूहानी तरबियत (आध्यात्मिक प्रशिक्षण), सब्र (धैर्य), हमदर्दी (सहानुभूति) और अल्लाह की नेमतों की क़द्र सिखाने का ज़रिया है।
मुफ्ती सलाउद्दीन अय्यूबी के मुताबिक़, रोज़ा इंसान को नफ़्स पर क़ाबू और तक़वा (परहेज़गारी) की तरफ़ लाता है।
कुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए जैसे तुमसे पहले लोगों पर किए गए थे ताकि तुम परहेज़गार बनो।”
(सूरह अल-बक़रह 2:183)
मुफ्ती सलाउद्दीन अय्यूबी कहते हैं कि इस आयत से साफ़ ज़ाहिर होता है कि रोज़े का मक़सद इंसान को अल्लाह का ख़ौफ़ और परहेज़गारी अता करना है।
जब कोई बंदा अल्लाह की रज़ा के लिए दिनभर भूखा-प्यासा रहता है, तो वह झूठ, ग़ुस्सा, हसद (ईर्ष्या) और ग़ीबत (चुगली) जैसी बुराइयों से बचता है।
यही रोज़े का असल फ़लसफ़ा है-नफ़्स पर काबू पाना और रूह को पाक बनाना।
रोज़े के मुआशरती और अख़लाक़ी अस्रात
रोज़ा एक ऐसी इबादत है जो समाज में बराबरी और हमदर्दी को मज़बूत करती है।
जब अमीर और ग़रीब दोनों एक ही हाल में भूख और प्यास की कैफ़ियत में होते हैं, तो दिलों में रहम और इंसानियत की भावना पैदा होती है।
रोज़ा इंसान के अख़लाक़ (चरित्र) को दुरुस्त करता है-वह झूठ, ग़ीबत, लालच और बुराई से दूर रहता है।
यह इबादत हमें यह समझाती है कि असली ताक़त अपनी ख़्वाहिशों को रोकने में है, न कि उन्हें पूरा करने में।
डॉ. मोहम्मद फ़ाज़िल के मुताबक़, साइंस ने भी यह साबित किया है कि रोज़ा रूहानी के साथ-साथ जिस्मानी तौर पर भी इंसान के लिए बेहद मुफ़ीद (फ़ायदेमंद) है।
साइंस की ज़बान में रोज़े को “इंटरमिटेंट फास्टिंग” कहा जाता है, जिस पर पूरी दुनिया में रिसर्च जारी है।
बदन की सफ़ाई और निज़ाम-ए-हज़्म की बेहतरी
रोज़े के दौरान जब इंसान कुछ वक्त तक नहीं खाता, तो जिस्म को आराम मिलता है।
डॉ. फ़ाज़िल के अनुसार, इससे लिवर साफ़ होता है, पेट मज़बूत होता है और जिस्म से ज़हरीले माद्दे (टॉक्सिन्स) निकल जाते हैं।
वज़न और शुगर पर कंट्रोल
रोज़े के दौरान जिस्म पहले ग्लूकोज़ और फिर चरबी (फैट) को एनर्जी के तौर पर इस्तेमाल करता है।
इससे वज़न कम होता है और ब्लड शुगर मुतवाज़िन (नियंत्रित) रहती है।
डॉ. फ़ाज़िल बताते हैं कि इंटरमिटेंट फास्टिंग डायबिटीज़ और मोटापे के ख़तरे को घटाती है।
दिल और दिमाग़ के लिए मुफ़ीद
रोज़ा कोलेस्ट्रॉल लेवल घटाता है, ब्लड प्रेशर को संतुलित रखता है और दिल की बीमारियों से बचाव करता है।
इसके अलावा, रोज़ा ब्रेन हार्मोन BDNF को बढ़ाता है जो याददाश्त और तवज्जोह़ (एकाग्रता) को बेहतर करता है।
ख़लियों की मरम्मत और उम्र में इज़ाफ़ा
डॉ. फ़ाज़िल बताते हैं कि रोज़े के दौरान जिस्म में “ऑटोफैजी” का अमल शुरू होता है—
यानी शरीर पुराने और नुक़सानदेह सेल्स को साफ़ कर नए बनाता है।
यह प्रक्रिया कैंसर के ख़तरे को घटाती है और इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाती है।
रोज़ा: रूह, जिस्म और मुआशरे की इस्लाह
इस्लाम में रोज़े को सिर्फ भूख-प्यास की इबादत नहीं, बल्कि ज़िंदगी का एक मुकम्मल उसूल कहा गया है।
यह इंसान को सब्र, शुक्र और ज़ब्त-ए-नफ़्स की तालीम देता है।
साइंस ने भी वही साबित किया जो 1400 साल पहले कुरआन ने बताया था
कि रोज़ा रूह, जिस्म और समाज-तीनों की सफ़ाई का बेहतरीन ज़रिया है।
रोज़ा इंसान को अल्लाह के क़रीब लाता है, सेहतमंद जिस्म देता है और मोहब्बत व हमदर्दी का पैग़ाम देता है।
यह सिर्फ एक इबादत नहीं, बल्कि इंसानियत की तालीम है।
आज जब इंसान अपनी ख़्वाहिशों का ग़ुलाम बन चुका है, रोज़ा हमें यह सिखाता है कि—
अपने ऊपर क़ाबू पा लेना ही असली आज़ादी है।
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