भारतीय किसान : उपेक्षा, षड्यंत्र और पुनर्निर्माण की आवश्यकता (एक समाजशास्त्रीय, संवैधानिक और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण)



भारत को यदि समझना है तो उसकी राजनीति से नहीं, उसकी खेती से समझना होगा। क्योंकि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और गांवों की आत्मा किसान है। इसके बावजूद यह देश एक भयावह विरोधाभास का शिकार है—जो किसान देश की 140 करोड़ आबादी का पेट भरता है, वही आज सबसे अधिक भूखा, कर्ज़दार, असुरक्षित और अपमानित है। यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सभ्यतागत संकट है, जो भारत के भविष्य को सीधे चुनौती देता है।

कृषि संकट : एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के बाद भारत ने औद्योगीकरण को विकास का मुख्य इंजन माना। खेती को सहारा देने वाला क्षेत्र समझा गया, न कि विकास का केंद्रीय आधार। हरित क्रांति ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन उसने किसानों को रासायनिक खाद, महंगे बीज और सिंचाई के असमान ढांचे पर निर्भर बना दिया। धीरे-धीरे किसान आत्मनिर्भर उत्पादक से बाज़ार पर निर्भर उपभोक्ता बनता चला गया।

आज स्थिति यह है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है—बीज, खाद, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, मजदूरी—सब कुछ महंगा है, लेकिन फसल का मूल्य स्थिर या गिरता हुआ है। यह असंतुलन ही किसान संकट की जड़ है।

आत्महत्या : आंकड़ा नहीं, सामाजिक त्रासदी

हर साल हज़ारों किसान आत्महत्या करते हैं। यह केवल आर्थिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान, असहायता और टूटे हुए आत्मसम्मान की परिणति है। किसान तब आत्महत्या करता है जब वह खुद को परिवार, समाज और राज्य—तीनों से ठगा हुआ महसूस करता है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि नीतिगत हिंसा का नतीजा है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) : अधिकार या छलावा

सरकारें MSP का ढोल पीटती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अधिकांश किसान MSP पर अपनी फसल बेच ही नहीं पाते। MSP को कभी भी कानूनी अधिकार नहीं बनाया गया।
स्वामीनाथन आयोग ने स्पष्ट कहा था कि किसान को उसकी फसल की कुल लागत (C2) पर 50 प्रतिशत लाभ मिलना चाहिए। यह कोई असंभव मांग नहीं, बल्कि किसान के जीवन और सम्मान का न्यूनतम आधार है।

लेकिन सत्ता इस सिफारिश से डरती है, क्योंकि इससे कॉरपोरेट मुनाफ़े पर अंकुश लगेगा। सच यह है कि भारत की कृषि नीति किसान के लिए नहीं, बल्कि बाज़ार और बड़े पूंजीपतियों के हित में गढ़ी जा रही है।

कर्ज़ का जाल और बैंकिंग व्यवस्था की विफलता

आज किसान खेती के लिए नहीं, बल्कि कर्ज़ चुकाने के लिए खेती कर रहा है। सरकारी बैंक किसान को जोखिम भरा मानते हैं, जबकि बड़े उद्योगपतियों को हज़ारों करोड़ का ऋण आसानी से मिल जाता है। किसान मजबूर होकर साहूकारों के पास जाता है, जहां ऊँचा ब्याज उसकी कमर तोड़ देता है।

बार-बार की कर्ज़ माफी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक अस्थायी मरहम है। ज़रूरत है—

ब्याज-मुक्त या न्यूनतम ब्याज पर कृषि ऋण

किसान के लिए अलग बैंकिंग ढांचा

कृषि बीमा की वास्तविक और त्वरित व्यवस्था

बीज, खाद और कृषि पर कॉरपोरेट कब्ज़ा

आज किसान अपनी ही खेती में मालिक नहीं रहा। बीज कंपनियां तय करती हैं कि किसान क्या बोएगा, कैसे बोएगा और कितनी बार खरीदेगा। देसी बीजों को योजनाबद्ध तरीके से हाशिए पर डाल दिया गया है। हर साल महंगे हाइब्रिड बीज खरीदने की मजबूरी ने किसान को आधुनिक गुलामी में धकेल दिया है।

सरकार को चाहिए कि—

देसी और पारंपरिक बीजों को संरक्षण दे

बीज और खाद पर सार्वजनिक नियंत्रण बढ़ाए

जैविक और प्राकृतिक खेती को नीति स्तर पर बढ़ावा दे

सिंचाई और जल संकट

भारत में आज भी बड़ी खेती वर्षा पर निर्भर है। सिंचाई योजनाएं काग़ज़ों में हैं, खेतों तक नहीं। जल संकट आने वाले समय में किसान की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है। नदियों, तालाबों और भूजल का संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, कृषि अस्तित्व का प्रश्न है।

किसान को उत्पादक से उद्यमी बनाना

खेती तब तक लाभकारी नहीं हो सकती जब तक किसान केवल कच्चा माल बेचता रहेगा। किसान को उद्यमी बनाना होगा।
इसके लिए आवश्यक है—

गांव स्तर पर फूड प्रोसेसिंग यूनिट

कोल्ड स्टोरेज और भंडारण सुविधाएं

सहकारी मॉडल को मज़बूती

बिचौलियों की भूमिका समाप्त करना

किसान को सीधे उपभोक्ता और बाज़ार से जोड़ना

जब तक किसान मूल्य श्रृंखला का अंतिम नहीं, बल्कि केंद्रीय हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक शोषण जारी रहेगा।

किसान आंदोलन और लोकतंत्र

हाल के वर्षों में किसान आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसान अब चुप रहने वाला नहीं है। लोकतंत्र में सड़क पर उतरना किसान की मजबूरी बन चुकी है, क्योंकि नीति-निर्माण में उसकी आवाज़ को सुना ही नहीं जाता। जो भी कानून किसान को उसकी ज़मीन से बेदख़ल करे, उसे मज़दूर बनाए या कॉरपोरेट के अधीन करे—वह कानून लोकतांत्रिक नहीं हो सकता।

किसानों के बच्चों का भविष्य

किसान आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी का अंधकार है। किसानों के बच्चों के लिए—

मुफ़्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

छात्रवृत्ति और तकनीकी प्रशिक्षण

कृषि आधारित स्टार्टअप और रोज़गार
राज्य की जिम्मेदारी है, दया नहीं।

संवैधानिक दायित्व

भारत का संविधान राज्य को निर्देश देता है कि वह सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करे (अनुच्छेद 38, 39)। किसान को न्याय देना कोई राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य है। जो नीति किसान को कमज़ोर करे, वह राष्ट्र को कमज़ोर करती है।

निष्कर्ष : किसान बचेगा तो भारत बचेगा

किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता है।
किसानों की समस्या केवल कृषि की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की समस्या है।

अब समय आ गया है कि किसान को वोट बैंक नहीं, नीति का केंद्र बनाया जाए।
नारों से नहीं, ठोस और ईमानदार नीतियों से।
यही सच्चा राष्ट्रवाद है, यही सामाजिक न्याय है और यही भारत के पुनर्निर्माण की कुंजी है।

लेखक :
अनिल भारती, एडवोकेट व समाजशास्त्री
राष्ट्रीय अध्यक्ष – राष्ट्रवादी जनता पार्टी (RJP)

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