अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव का स्पष्ट आकलन नहीं: सांसद नीरज मौर्य
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
लोकसभा में उठाया एआई चिप्स और जीपीयू निर्यात प्रतिबंधों का मुद्दा, कहा-तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए ठोस रणनीति जरूरी
नई दिल्ली/बरेली।सांसद नीरज मौर्य द्वारा लोकसभा में पूछे गए प्रश्न से यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) चिप्स और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) पर अमेरिका द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों के भारत के एआई विकास पर वास्तविक प्रभाव को लेकर सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट आकलन सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया है।
सांसद नीरज मौर्य ने सरकार से पूछा था कि क्या संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा एआई चिप्स और जीपीयू के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों का भारत में एआई विकास, इन चिप्स की उपलब्धता और उनकी खरीद लागत पर कोई प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि राष्ट्रीय एआई मिशन के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से एआई अवसंरचना को मजबूत करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है तथा भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन की डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) नीति के तहत चिप डिजाइन और उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में क्या प्रगति हुई है।
सरकार की ओर से दिए गए उत्तर में बताया गया कि मार्च 2024 में 10,372 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ इंडिया एआई मिशन शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य देश में एआई इकोसिस्टम को मजबूत करना है। सरकार के अनुसार अब तक 14 एआई सेवा प्रदाताओं को सूचीबद्ध किया गया है। इसके अलावा सेमीकंडक्टर डिजाइन से जुड़ी 24 परियोजनाओं को भी मंजूरी दी गई है, जिनकी कुल परियोजना लागत लगभग 900 करोड़ रुपये है।
हालांकि सांसद नीरज मौर्य का कहना है कि उनके प्रश्न का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों के संभावित प्रभाव का आकलन जानना था, लेकिन मंत्री के उत्तर में मुख्य रूप से विभिन्न योजनाओं और पहलों का विवरण दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन प्रतिबंधों का भारत के एआई विकास, चिप्स की उपलब्धता और लागत पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा है।
सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि एआई और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। बाहरी तकनीकी प्रतिबंधों के प्रभाव का स्पष्ट आकलन करना और घरेलू उत्पादन क्षमता को तेजी से विकसित करने के लिए ठोस रणनीति बनाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि तकनीकी क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को नीति और क्रियान्वयन दोनों स्तरों पर अधिक सक्रिय और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में किसी भी बाहरी तकनीकी प्रतिबंध का देश की प्रौद्योगिकी प्रगति पर नकारात्मक असर न पड़े।
Comments
Post a Comment