असम में संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक विरासत पर सवालिया निशान
शुएब रज़ा फातमी
भारत एक ऐसा देश है जो दुनिया में अपनी बहुआयामिता, सांस्कृतिक विविधता, संवैधानिक समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह वह धरती है जहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और नस्लें एक साथ रहती आई हैं। मगर अफसोस कि पिछले कुछ वर्षों से देश के कुछ हिस्सों में ऐसी नीतियाँ और रवैये अपनाए जा रहे हैं जो न केवल इस विविधता को खत्म कर रहे हैं बल्कि संविधान की बुनियाद को भी कमजोर कर रहे हैं। असम राज्य में मुसलमानों को बेघर किया जाना और उनके अस्तित्व पर सवाल उठाया जाना इन्हीं घटनाओं में से एक है।
केंद्र के इशारे पर असम में यह जुल्म मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि वे नरेंद्र मोदी एंड कंपनी में अपनी खास पहचान बना सकें। लेकिन उनके इस आक्रामक और मुस्लिम-विरोधी रवैये ने धीरे-धीरे इसे एक वैश्विक मुद्दा बना दिया है, जिसने देश की लोकतांत्रिक आत्मा पर गहरी चोट की है।
भारत का संविधान अपने नागरिकों को धर्म, नस्ल, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव से रोकता है। अनुच्छेद 14 सबके लिए समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 15 धार्मिक आधार पर भेदभाव से मना करता है और अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन असम में इन संवैधानिक गारंटियों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। हज़ारों मुस्लिम परिवारों को मात्र शक और शुबह के आधार पर विदेशी घोषित कर उनके घरों को बुलडोज़रों से ढहा दिया जा रहा है। सवाल यह है कि जब कोई नागरिक बार-बार अपनी पहचान के कागज़ात पेश कर रहा है, जब उसके पूर्वजों की कब्रें उसी मिट्टी पर हैं, जब उनकी भाषा, खेत-खलिहान और मोहल्ले असम के इतिहास का हिस्सा हैं, तो फिर उन्हें बेघर करने का यह खेल किस संविधान के तहत खेला जा रहा है?
असम में यह विवाद नया नहीं है। 1979 से लेकर 1985 तक असम आंदोलन के नाम पर जो आंदोलन चला, उसमें लाखों लोगों को “विदेशी” बताकर निशाना बनाया गया। 1985 के असम समझौते ने यह तय किया कि 25 मार्च 1971 के बाद आए लोगों को विदेशी माना जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि इस समझौते की आड़ में मुसलमानों को ज़्यादा निशाना बनाया गया। 2019 में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) की सूची आई जिसमें लगभग 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उनमें बड़ी संख्या हिन्दुओं की भी थी, लेकिन असली निशाना मुसलमान ही बने। आज भी वे लोग अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अनिश्चित और कष्टदायी अदालती प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
गाँव के गाँव उजाड़े जा रहे हैं। बूढ़ी औरतें, बच्चे, नौजवान सभी सड़कों पर आ गए हैं। जिनके घर ढहाए गए, वे सालों से खेती करके अपने परिवार का पेट पालते थे। अब वे बेज़मीन और बेघर हो गए। स्कूल जाने वाले बच्चे खुले आसमान के नीचे बैठे हैं। औरतें रात-रात भर अपनी अस्मिता बचाने के लिए डर में जी रही हैं। क्या यह किसी लोकतांत्रिक देश की तस्वीर है या किसी निरंकुश शासन की? इंसानियत का तक़ाज़ा तो यह था कि राज्य कमज़ोर और पिछड़े वर्ग को सहारा देता, लेकिन असम में तो राज्य खुद उनके अस्तित्व को मिटाने पर तुला है
असम में “विदेशी” का ठप्पा केवल मुसलमानों पर क्यों लगाया जाता है? क्या इस राज्य में आने वाले सभी बंगाली भाषी सिर्फ मुसलमान हैं? बिल्कुल नहीं। लेकिन चूँकि देश की मौजूदा राजनीति में मुसलमानों को “अजनबी” या “पराया” बनाने की साज़िश है, इसलिए असम में भी यही खेल दोहराया जा रहा है। यह वही मानसिकता है जो देश के दूसरे हिस्सों में कभी लव जिहाद, कभी भीड़तंत्र हिंसा, कभी नागरिकता कानून (CAA) के रूप में नज़र आती है। असम में मुसलमानों को बेघर करना दरअसल पूरे देश में मुसलमानों को हाशिए पर धकेलने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है।
आजादी के बाद भारत ने जो रास्ता चुना था वह था धर्मनिरपेक्षता, समानता और लोकतंत्र का। लेकिन आज असम में जो कुछ हो रहा है, वह न केवल उस रास्ते से विचलन है बल्कि हमारे बुज़ुर्गों की कुर्बानियों का अपमान भी है। आज़ादी के मतवालों ने किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि सबके लिए यह देश आज़ाद कराया था। लेकिन आज राज्य की मशीनरी को बहुसंख्यक वोट बैंक के दबाव में इस्तेमाल कर एक धर्म विशेष के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश की जा रही ।
असम हमेशा से विभिन्न सभ्यताओं और भाषाओं का संगम रहा है। लेकिन आज मुसलमान और गैर-मुसलमान, बंगाली और असमी, सबके बीच नफरत की दीवार खड़ी की जा रही है। राजनीतिज्ञों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए जनता को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है। यह सामाजिक सौहार्द के लिए बेहद ख़तरनाक है। अगर यही रवैया जारी रहा तो असम में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
अफसोस की बात है कि जब मुसलमानों के घरों पर बुलडोज़र चलते हैं, जब उन्हें विदेशी घोषित किया जाता है, जब औरतें और बच्चे बेघर होते हैं, तो देश की अदालतें ज्यादातर चुप रहती हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता या मानवाधिकार संगठन आवाज़ उठाते हैं, लेकिन उनकी भी सुनवाई कम ही होती है। संविधान के रक्षक संस्थान जब अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि आम नागरिक अपनी पनाह कहाँ तलाश करे?
असम में मुसलमानों की आबादी लगभग 34 प्रतिशत है। यह संख्या किसी भी चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती है। इसलिए एक सोची-समझी योजना के तहत उन्हें कमज़ोर करने और बेदखल करने की साज़िश की जा रही है ताकि वे राजनीतिक रूप से अप्रभावी हो जाएँ। यह सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों को पिछड़ा रखने की कोशिश है।
संविधान की सर्वोच्चता: संवैधानिक संस्थाओं को जागरू होना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी नागरिक धर्म के आधार पर भेदभाव का शिकार न हो।
न्यायपालिका का सक्रिय हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञा लेते हुए असम में मुसलमानों की बेदखली पर रोक लगानी चाहिए
सिविल सोसाइटी की भागीदारी: मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों और मीडिया को इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना होगा ताकि आवाज़ दब न सके।
राजनीतिक एकजुटता: विपक्षी दलों को मुसलमानों के साथ खड़ा होना चाहिए, सिर्फ बयान देने के बजाय ठोस कदम उठाने चाहिए।
मुसलमानों की जागरूकता: खुद मुसलमानों को भी शैक्षिक, सामाजिक और कानूनी स्तर पर ज्यादा जागरूक होना होगा ताकि वे अपने अधिकार के लिए प्रभावी ढंग से लड़ सकें
असम में मुसलमानों को बेघर करना केवल एक धार्मिक अल्पसंख्यक पर हमला नहीं बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र पर हमला है। अगर आज इस पर चुप्पी साधी गई तो कल यही रवैया किसी और वर्ग को निशाना बनाएगा। यह समय है कि हम सब मिलकर आवाज़ बुलंद करें, वरना इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।
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