भाजपा के शासन काल में वजूद में आई "इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल" का वजूद क्या भाजपा के शासन काल में ही खत्म होगा?

बेताब समाचार एक्सप्रेस के लिए मुस्तकीम मंसूरी की रिपोर्ट, 

बरेली, इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल (आईएमसी ) का गठन वर्ष 2001 में हुआ, जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे, उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह थे, और वर्तमान समय में 
भी एनडीए की सरकार है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री है, इस दौरान आईएमसी के गठन से गुज़रे 24 सालों में भाजपा सपा बसपा की सरकारें रही और आईएमसी प्रमुख का राजनीतिक कद और लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही क्योंकि आईएमसी प्रमुख का जन्म विश्व विख्यात अला हज़रत परिवार में होना प्रमुख कारण रहा। आईएमसी प्रमुख तौकीर रज़ा ख़ान को मौलाना तौकीर रज़ा ख़ान के नाम से एक शख्सियत के रूप में लोग मानने लगे। यही कारण रहा की तौकीर रज़ा ख़ान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी, आपको बताते चलें कि वर्ष 1980 में मुस्लिम समाज में कांग्रेस की खराब होती छवि को ध्यान में रखते हुए तौकीर रज़ा ख़ान के पिता मौलाना रेहान रज़ा खान को कांग्रेस ने विधान परिषद का सदस्य बनाकर मुस्लिम समाज में कांग्रेस की खराब होती छवि को बेहतर बनाने का प्रयास किया था। यही कारण था कि तौकीर रज़ा ख़ान ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वर्ष 1985 में बिनावर विधानसभा से चुनाव लड़ा और चुनाव बुरी तरह से हारने के बाद तौकीर रज़ा ख़ान ने फरवरी 1986 में बाबरी मस्जिद के मामले में गिरफ्तारियां देने का ऐलान कर दिया उस समय लगभग 1100 लोगों ने गिरफ्तारियां दी थी और सभी को फतेहगढ़ जेल भेजा गया था। लेकिन तौकीर रज़ा ख़ान ने उस वक्त गिरफ्तारी नहीं दी थी, बल्कि एमएलसी बनने की लालसा में उस समय कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह से मिलने कांग्रेस एमएलसी डी एच अंसारी के साथ तौकीर रज़ा ख़ान व तौसीफ रज़ा ख़ान दोनों भाई लखनऊ पहुंच गए। लेकिन एमएलसी बनने का सपना पूरा नहीं हो सका। लेकिन वर्ष 1998 में तौकीर रज़ा ख़ान को भाजपा कोटे से 
वक्फ बोर्ड का मेंबर नामित किये जाने के बाद वर्ष 2001 में तौकीर रज़ा ख़ान ने इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल राजनीतिक दल बनाकर सियासी शतरंज बिछा कर वक्फ बोर्ड मेंबर की पावर का इस्तेमाल करते हुए वर्ष 2001 में पहलवान साहब के मज़ार पर मुतावल्ली रईस मियां क़ादरी की कमेटी को निरस्त करा कर अपने लोगों की कमेटी बनवाकर प्रशासन द्वारा कब्जा ले लिया, जो अब तक क़ायम है वही दरगाह शाहदाना वाली पर भी तौकीर रज़ा की अपने नजदीकी को मुतावल्ली बनवाने में भी ख़ास भूमिका रही, इसके अलावा वक्फ नंबर 169 पर भी कब्जे का प्रयास किया गया लेकिन क्षेत्रीय लोगों ने अख्तर रज़ा का अज़हरी मियां को मस्जिद ख़ान बहादुर ख़ान में जुमे की नमाज़ पढ़ाने के लिए बुलाकर वक्फ नंबर 169 को बचा लिया, इस तरह तौकीर रज़ा और उनकी टीम आर्थिक तौर पर लगातार मजबूत होती गई, वहीं 2010 की बसपा सरकार में हुए दंगे में तौकीर रज़ा ख़ान को नामज़त करते हुए प्रशासन ने जेल भेजा था उसी दौरान बसपा के कई कद्दावर मुस्लिम नेताओं के आग्रह पर रिहाई के आदेश हुए थे, इसी तरह वर्ष 2011 में जब प्रवीण तोगढ़िया ने त्रिशूल बांटने का ऐलान किया तब भी तौकीर रज़ा ख़ान ने तलवारे बांटने का ऐलान कर प्रदेश के माहौल को गर्माने का प्रयास किया था, लेकिन प्रदेश के अमन पसंद लोगों ने तोगड़िया और तौकीर के आवाहन को नकार दिया था, लेकिन इस बार आई लव मोहम्मद के प्रदर्शन को लेकर 26 सितंबर के कार्यक्रम को प्रशासन द्वारा अनुमति न देने के बाद भी कार्यक्रम करने की तौकीर रज़ा की ज़िद ने अपने मददगारों और मुस्लिम नौजवानों को बड़ा नुकसान पहुंचा दिया। वहीं जिला प्रशासन ने बेहतर सूझबूझ और सख्ती के साथ पेश आते हुए बरेली को बद अमनी
 की आग से बचा लिया।

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