अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने पेरू में होने वाली अंतरराष्ट्रीय बीज संधि पर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार की "देशद्रोही" भूमिका की निंदा की; और राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया
नई दिल्ली, 13 नवंबर 2025: अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने आज 24 से 29 नवंबर, 2025 तक लीमा, पेरू में होने वाली 'खाद्य और कृषि हेतु आनुवंशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (International Treaty on Plant Genetic Resources for Food and Agriculture - ITPGRFA)' में भारत की बीज संप्रभुता के सरकारी समर्पण की पुरज़ोर निंदा की है।
हम केंद्र सरकार की दोगली नीति पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हैं। जहां एक ओर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान देश में किसानों के हितैषी का चोला ओढ़कर पुरस्कार बांट रहे हैं और प्लांट वैरायटी एक्ट में संशोधन की बात कर रहे हैं, वहीं उनके अपने वार्ताकार पेरू में हमारी राष्ट्रीय कृषि विरासत को वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने की तैयारी कर रहे हैं। यह महज़ पाखंड नहीं, बल्कि भारत के 'अन्नदाताओं' के साथ सीधा विश्वासघात है।
देश में नाटक, विदेश में आत्मसमर्पण
कृषी मंत्री चौहान का हालिया भाषण, जिसमें उन्होंने PPV&FRA (प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट्स ऑथोरिटी) की तारीफ की और किसानों को प्रोत्साहन देने का वादा किया, वह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तबाही मचाने वाले एजेंडे के लिए एक धुंए का परदा है। सरकार ITPGRFA में उन प्रस्तावों पर सहमति देने पर विचार कर रही है, जो भारत के पूरे राष्ट्रीय बीज संग्रह (हज़ारों देशज किस्मों और किसानों की varieties) को कॉरपोरेट एक्सेस के लिए एक वैश्विक पूल में ज़बरन डाल देगा। 12,000 साल पुरानी कृषि सभ्यता द्वारा किसानों को दिए गए सशक्तिकरण के हर वादे के कदम के विपरीत है।
एक 'सौदे' की संरचना : सबसे गंभीर खतरा संधि की 'बहुपक्षीय प्रणाली' (Multilateral System) में सभी पादक आनुवंशिक संसाधनों को शामिल करने का प्रस्ताव है। यह 'आनुवंशिक संसाधनों की बिक्री' है, जिसके भयावह परिणाम होंगे:
1. हमारे जन्मसिद्ध कृषि अधिकार की चोरी: हमारी अमूल्य जैव विविधता, जिसे किसानों की पीढ़ियों ने विकसित और संरक्षित किया है, विदेशी कृषि व्यवसाय के लिए स्वतंत्र रूप से सुलभ बना दी जाएगी। यही कंपनियां फिर हमारे अपने संसाधनों पर पेटेंट कराकर उन्हें हमें वापस बेचेंगी, जिससे उनके सच्चे सृजकों को उनसे वंचित कर दिया जाएगा।
2. लाभ-बंटवारे की एक ढोंग प्रणाली: मौजूदा 'बेनिफिट-शेयरिंग फंड' (Benefit-Sharing Fund) पूरी तरह विफल रहा है । जबकि हमारे बीजों ने वैश्विक स्तर पर अरबों का मुनाफा कमाया है, भारत या यहां के किसानों के पास इसका नगण्य हिस्सा ही लौटता है । यह विस्तार एकतरफा लूट है, जहां भारत सब कुछ देता है और कुछ भी नहीं पाता।
3. वैधिक डिजिटल बायोपायरेसी (चोरी): यह संधि 'डिजिटल सीक्वेंस इनफार्मेशन' (DSI) - हमारे बीजों की आनुवंशिक नक्शे - को नियंत्रित करने में विफल है। यह हमारे संसाधनों की डिजिटल चोरी को संभव बनाता है, जिससे कंपनियां उन पर पेटेंट करा सकती हैं और सभी लाभ-बंटवारे के दायित्वों से बच सकती हैं। सरकार 21वीं सदी की इस लूट को मदद पहुंचा रही है।
हमें आश्चर्य इस बात पर है कि सरकार के मुख्य वार्ताकार, डॉ. सुनील अर्चक, इन अस्तित्वगत खतरों को कम करके आंक रहे हैं। उनका यह दावा कि भारत के पास अभी भी यह तय करने की स्वतंत्रता है कि क्या साझा करना है, यह बात तथ्यात्मक रूप से गलत और खतरनाक रूप से भ्रामक है। यह संधि एक बाध्यकारी कानूनी दायित्व बनाती है। उनकी स्थिति भारत के राष्ट्रीय हित और हमारे अपने जैव विविधता अधिनियम की भावना के साथ सीधे टकराव को दर्शाती है।
हमारी मांगें और कार्रवाई का आह्वान
अखिल भारतीय किसान सभा, लाखों किसानों का प्रतिनिधित्व करते हुए, भारत सरकार से निम्न मांग करती है:
1. तत्काल और सार्वजनिक रूप से 'बहुपक्षीय प्रणाली' के विस्तार को अस्वीकार करे।
2. एक अनिवार्य, पारदर्शी और न्यायसंगत प्रणाली के लिए लड़े, जो यह सुनिश्चित करे कि कंपनियां हमारे आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त व्यावसायिक लाभों की कीमत चुकाएं ।
3. DSI को सख्त संधि विनियमन और लाभ-बंटवारे के दायरे में लाकर डिजिटल बायोपायरेसी से हमारे संसाधनों की रक्षा करे, ।
4. डॉ. सुनील अर्चक सहित वर्तमान वार्ता दल को तुरंत बदलकर ऐसे लोगों को नियुक्त किया जाय, जो ईमानदार हों और राष्ट्रीय तथा किसान हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध हों ।
बीज संप्रभुता का यह समर्पण, एमएसपी की कानूनी गारंटी और पूर्ण कर्ज़माफी से इनकार जैसी किसान विरोधी नीतियों की नवीनतम कड़ी है। इसलिए, AIKS एक राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा करती है।
हम सभी किसान संगठनों, एसकेएम (SKM) के सहयोगियों और नागरिकों से इस विश्वासघात के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान करते हैं। हम 26 नवंबर से विरोध-प्रदर्शनों की एक श्रृंखला शुरू करेंगे।
हमारे बीज ही हमारी संप्रभुता हैं, और हम किसी भी सरकार को उन्हें सौंपने नहीं देंगे।
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