राजनीतिक लाभ के लिए बाबरी मस्जिद के नाम पर शिलान्यास-क्या लोकतंत्र के लिए घातक संकेत?

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

लखनऊ, 6 दिसंबर भारत के इतिहास का वह दिन है, जो हमेशा धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। इसी दिन वर्ष 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढाहाई गई थी, जिसने देश के सांप्रदायिक स्वास्थ्य पर गहरी चोट की थी। ऐसे में इस तारीख पर बाबरी मस्जिद के नाम से किसी शिलान्यास या राजनीतिक आयोजन की घोषणा, लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़े करती है। इस्लाम में मस्जिद सिर्फ़ अल्लाह की इबादत का स्थान है-ना राजनीति का, ना बदले का, ना प्रदर्शन का। और मस्जिदें  अल्लाह के लिए है, मस्जिद का मक़सद सिर्फ इबादत, अल्लाह का जिक्र और अमन फैलाना है-किसी विवाद या उकसावे का नहीं। 

विवादित ज़मीन या विवादित नाम पर मस्जिद बनाना इस्लामी दृष्टिकोण से बाबरी मस्जिद जैसा विवादित नाम या 6 दिसंबर की तारीख पर संगेबुनियाद रखना या नामकरण करना शरीअतन मुनासिब नहीं है, बल्कि यह फसाद और नफ़रत को बढ़ा सकता है, जिससे अल्लाह नाराज होता है। इस्लाम हमें यह सिखाता है कि "अतीत के फ़साद को नहीं, बल्कि भविष्य के अमन को प्राथमिकता दो।
6 दिसंबर जैसे विवादित दिन पर मस्जिद का ऐलान या निर्माण ग़ैर मुनासिब-शरण में इसकी इजाजत नहीं, इस्लामी दृष्टि से सही रवैया अमन, सब्र और इंसाफ पुराने विवाद को दोबारा ना उठाना, मुफ्तियों और विद्वानों सभी ने विवाद और फितना से बचाने को प्राथमिकता दी है।
वहीं दूसरी तरफ देखें तो पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के भरतपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को बंगाल की राजनीति में नया ध्रुवीकरण का खेल खेलते हुए 6 दिसंबर 2025 को बाबरी मस्जिद के नाम से बाबरी मस्जिद जैसी मस्जिद बनाने का ऐलान करते हुए 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद की संगें बुनियाद (शिलान्यास) करते हुए राजनीतिक रूप से भाजपा को भी एक नैरेटिव दे दिया है: भाजपा के लिए यह मुद्दा "हिंदू वोटो का ध्रुवीकरण "करने में उपयोगी तो हो सकता है। वही राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि धर्म और राजनीति के मिलन से न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों पर असर पड़ता है, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव को भी चोट पहुंचा सकता है। लोकतंत्र में नागरिकों की आस्था संविधान पर होती है, न कि किसी धर्म या प्रतीक पर आधारित राजनीति पर, वही संविधान विशेषज्ञाओं ने भी चेताया है कि देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने के लिए ऐसे कदमों से बचना जरूरी है, जो किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करें। क्योंकि लोकतंत्र तब ही सशक्त होता है, जब राजनीति एकता की राह पर चले, न कि विभाजन की दिशा में।
वही रसूलुल्लाह ने फ़रमाया: "अल्लाह पाक है और वही चीज क़ुबूल (स्वीकार) करता है जो पाक हो।"इस हदीस के मुताबिक अगर मस्जिद का नाम या निर्माण विवाद, झगड़ा या राजनीति से जुड़ा हो-तो उसकी "पाकी"(शुद्धता) पर सवाल उठता है। इसलिए विवादित नाम या जगह पर मस्जिद बनाना शरीअतन मकरुह 
तहरीमी (ग़ैर-जायज़ के करीब) माना गया है। वही शरीयत-ग़ैर शरीयत पर फ़तबे देने वालों की ख़ामोशी विधायक हुमायूं कबीर के ग़ैर  शरई तरीके से 6 दिसंबर 2025 को बाबरी मस्जिद की बुनियाद रखे जाने को शरीअतन मकरूह तहरीमी (ग़ैर-जायज़) क़रार का फ़तवा जारी न करना अपने आप में कई तरह के सवाल खड़े करता है। अब सवाल यह उठता है की विवादित तारीख 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद के विवादित नाम पर मस्जिद की तामीर के लिए जो लाखों लोग चंदा दे रहे हैं, क्या शरई-ग़ैर शरई के नाम पर फ़तबे देने वालों की ख़ामोशी पर क्या खुद गुनहगार नहीं होंगे?

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