"खैराबादी खानदान: दीन से इल्हाद तक — एक फिक्री सफ़र का दर्दनाक अंजाम"

बेताब समाचार एक्सप्रेस के लिए मुस्तकीम मंसूरी की ख़ास रिपोर्ट

 जावेद अख़्तर का नाम आज हिंदुस्तान की अदबी दुनिया में किसी पहचान का मोहताज नहीं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका खानदान कभी इल्म-ओ-दीन, तसव्वुफ़ और आज़ादी की जद्दोजहद का अलमबरदार हुआ करता था।
जावेद अख्तर के परदादा मौलाना फ़ज़ल हक़ खैराबादी 1857 की जंग-ए-आज़ादी के अज़ीम मुजाहिद, शेख़ुल इस्लाम और कुरआन के गहरे आलिम थे। उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया, जिसके चलते उन्हें कालापानी की सज़ा हुई और वहीं शहादत पाई।
उनके बेटे मुजतर खैराबादी भी एक बड़े शायर, फिक्री रौशनज़म और दीनी विरासत के सच्चे वारिस थे।
फिर दौर आया जानिसार अख्तर का — एक अज़ीम शायर, लेकिन समाजवादी सोच और लादीनियत (नास्तिकता) के असर में मज़हब से दूर होते चले गए।
और अब उसी सिलसिले की आख़िरी कड़ी हैं जावेद अख्तर — जो इल्हाद (नास्तिकता) को खुलेआम अपनाने और खुदा के वजूद से इंकार करने में यक़ीन रखते हैं।
यह सिर्फ़ एक खानदान की कहानी नहीं, बल्कि एक सबक़ है —
जब नई नस्लों में ईमान की शमा बुझा दी जाती है, तो आने वाले वक्त में वह रौशनी कहीं गुम हो जाती है।
इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी औलाद को डॉक्टर, इंजीनियर या अफ़सर बनाने के साथ-साथ दीन की बुनियादी तालीम भी दें — ताकि वह मगरिबी तहज़ीब में पलकर खुदा के वजूद को झुठलाने वाले न बन जाएं।

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