“डॉ. अब्दुल जलील फरीदी: 85% बनाम 15% के सूत्रधार, जिन्होंने बहुजन-मुस्लिम एकता की नींव रखी”

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

काशीराम के मिशन के वैचारिक जनक थे डॉ. फरीदी-मायावती आज उस राह से भटकीं

लखनऊ, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले दूरदर्शी नेता डॉ. अब्दुल जलील फरीदी न केवल एक कुशल राजनेता थे, बल्कि जाति शास्त्र के माहिर, स्वतंत्रता सेनानी, चिकित्सक और समाजसेवी भी थे। उन्होंने उस दौर में यह समझ लिया था कि भारत में मुसलमानों को एक संप्रदाय आधारित पार्टी की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के लिए संघर्षरत व्यापक बहुजन गठबंधन का हिस्सा बनने की आवश्यकता है।
डॉ. फरीदी की राजनीतिक दृष्टि सांप्रदायिक सीमाओं से परे थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत में 85% आबादी — जिसमें ओबीसी, दलित और आदिवासी शामिल हैं — को 15% उच्च जातियां शासित कर रही हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने 3 जून 1968 को मुस्लिम मजलिस की स्थापना की, जिसका उद्देश्य केवल मुस्लिम हित नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का व्यापक एजेंडा था।
उनका एजेंडा था-धन का समान वितरण, शिक्षा और रोजगार के अवसरों में बराबरी, तथा शोषित वर्गों की आवाज़ को राजनीति के केंद्र में लाना।
1971 का ऐतिहासिक चुनाव — डॉ. फरीदी का फार्मूला सफल हुआ
1971 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मजलिस के 10 उम्मीदवारों में से 9 ने जीत दर्ज की, जिनमें 5 मुस्लिम और 4 दलित प्रत्याशी थे। केवल रामपुर से आज़म ख़ान चुनाव हारे, जो उस समय पहली बार मैदान में उतरे थे। इस शानदार प्रदर्शन ने साबित किया कि डॉ. फरीदी का “मुस्लिम–बहुजन गठबंधन” और 85% बनाम 15% का फार्मूला उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्रांतिकारी साबित हुआ।
काशीराम ने फरीदी को माना आदर्श
डॉ. फरीदी के विचारों से गहराई से प्रभावित होकर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काशीराम ने इस सोच को आगे बढ़ाया। डॉ. फरीदी का “85% बनाम 15%” का फॉर्मूला ही बाद में बहुजन आंदोलन का वैचारिक आधार बना। यही सोच आगे चलकर मायावती को उत्तर प्रदेश की सत्ता तक चार बार पहुंचाने में निर्णायक साबित हुई।
पेरियार सम्मेलन: एक ऐतिहासिक मील का पत्थर
सन 1968 में डॉ. फरीदी का पेरियार के साथ सम्मेलन भारतीय राजनीति के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। इस सम्मेलन ने पहली बार मुस्लिम और बहुजन नेतृत्व को एक मंच पर लाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी।
आज की राजनीति में फिर जरूरत है फरीदी के फार्मूले की
आज जब देश सांप्रदायिक और आर्थिक असमानता के दौर से गुजर रहा है, तब डॉ. फरीदी और काशीराम के मिशन की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। दुख की बात यह है कि आज मायावती डॉ फरीदी-काशीराम के मूल मिशन से भटक चुकी हैं, और सत्ता फिर से 15% लोगों के हाथों में केंद्रित हो गई है।
ऐसे समय में देश को फिर से जरूरत है डॉ. फरीदी के 85% बनाम 15% फार्मूले की — एक ऐसे मुस्लिम–बहुजन गठबंधन की, जो सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और मानवता के सिद्धांतों पर खड़ा हो।

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