मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा: सपा या बसपा, कौन है बेहतर विकल्प

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम समाज की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। राज्य की लगभग 20% आबादी मुस्लिम है, और इतने बड़े जनाधार को नज़रअंदाज़ कर कोई भी राजनीतिक पार्टी सत्ता की सीढ़ियां नहीं चढ़ सकती। लेकिन सवाल यह है कि आज जब राजनीति दिन-ब-दिन अधिक ध्रुवीकृत होती जा रही है, तब मुस्लिम समाज के हित, सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी के लिहाज़ से समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में से कौन-सा विकल्प ज़्यादा भरोसेमंद साबित हो सकता है?

सपा: परंपरागत साझेदारी और भावनात्मक जुड़ाव
समाजवादी पार्टी का मुस्लिम समाज से रिश्ता केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित नहीं रहा। मुलायम सिंह यादव के दौर से ही मुसलमानों ने सपा को "अपना राजनीतिक ठिकाना" माना। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सपा ने मुस्लिम समाज के दर्द को आवाज़ दी, और "मुसलमानों की हिफ़ाज़त" का नारा समाजवादी राजनीति का अहम हिस्सा बन गया।
अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने युवाओं, शिक्षा और रोज़गार के मुद्दों पर भी मुस्लिम वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया। बरेली, मुरादाबाद, संभल, आज़मगढ़, रामपुर और सहारनपुर जैसे क्षेत्रों में सपा को हमेशा मज़बूत समर्थन मिला। लेकिन हाल के वर्षों में एक बड़ा सवाल यह भी उठता रहा है कि सपा ने मुस्लिम समाज को केवल "मतदाता" के रूप में इस्तेमाल किया या "निर्णायक साझेदार" के रूप में जगह दी?

सपा पर यह आरोप बार-बार लगा कि उसने मुस्लिम चेहरों को केवल “सजावट” की भूमिका में रखा, जबकि असली निर्णय लेने की शक्ति यादव नेताओं तक सीमित रही। यही कारण है कि कई बार सपा सरकारों के दौरान भी सांप्रदायिक दंगे या उत्पीड़न की घटनाएं मुस्लिम समाज को आहत करती रहीं।

बसपा: सामाजिक न्याय की राजनीति और "सुरक्षा" की ठोस छवि
बहुजन समाज पार्टी का मुस्लिम समाज से रिश्ता सपा जितना भावनात्मक नहीं, लेकिन उतना ही रणनीतिक रहा है। कांशीराम और मायावती ने हमेशा “बहुजन एकता” का नारा दिया  जिसमें दलित, पिछड़े और मुस्लिम वर्ग को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश की गई।
बसपा की सबसे बड़ी ताकत उसकी संगठनात्मक अनुशासन और प्रशासनिक सख़्ती है। मायावती के शासन में क़ानून-व्यवस्था को लेकर जो छवि बनी, उसने मुस्लिम समाज में एक भरोसा पैदा किया कि "बहनजी के राज में सुरक्षा की गारंटी है"।
मुस्लिम वर्ग के लिए मायावती की रणनीति जातीय समीकरण से जुड़ी रही  दलित-मुस्लिम गठजोड़ की राजनीति को उन्होंने एक ठोस राजनीतिक समीकरण में बदला। बसपा ने कई बार मुस्लिम उम्मीदवारों को सम्मानजनक संख्या में टिकट भी दिए, जिससे उन्हें प्रतिनिधित्व की ठोस अनुभूति हुई।

बसपा का संगठन जमीनी स्तर पर उतना सक्रिय नहीं है जितना सपा का। इसके अलावा पार्टी का “साइलेंट मोड” में रहना कई बार मुस्लिम समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या बहनजी उनके मुद्दों पर खुलकर बोलने को तैयार हैं?

मुस्लिम समाज के सामने असली चुनौती क्या है?

आज मुस्लिम समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि राजनीतिक सुरक्षा और सम्मानजनक साझेदारी 
की है।जिसमें सुरक्षा, भीड़ हिंसा, भेदभाव, और सांप्रदायिक घटनाओं से बचाव।
साझेदारी टिकट, पद और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी।
 जो नेता केवल “आपके नाम पर वोट मांगते” नहीं, बल्कि “आपके लिए बोलते” भी हों।

वहीं सपा के पास मुस्लिम समाज से जुड़ाव की भावनात्मक पूंजी है तो वहीं बसपा के पास शासन की सख़्ती और सुरक्षा की ठोस छवि।
अगर कोई पार्टी भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ राजनीतिक भागीदारी और सम्मानजनक सुरक्षा की गारंटी दे पाए, तो वही भविष्य में मुस्लिम समाज की सच्ची प्रतिनिधि पार्टी कहलाएगी।
आज के माहौल में मुस्लिम समाज को यह तय करना होगा कि उन्हें “सुनने वाला साथी चाहिए या सुरक्षा देने वाला संरक्षक” क्योंकि आने वाले चुनावों में यही फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति की नई दिशा तय करेगा।

Comments

Popular posts from this blog

जमा-ए-अनवर पब्लिक स्कूल में प्ले ग्रुप से कक्षा 8वीं तक का परीक्षा फल वितरण हुआ रिपोर्ट कार्ड देखकर बच्चों के खिल उठे चेहरे*

बरेली शहर सीट पर सपा के ‘एजुकेशन आइकन’ मोहम्मद कलीमुद्दीन की दमदार दावेदारी, हजारों छात्रों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाकर बनाई मजबूत पहचान

पुलिस ने उसके बाप व भाई का भी धारा 170 बी एन एस एस में चालान कर एसडीएम नगीना की न्यायालय में पेश किया गया। जहां से दोनों को जमानत नहीं मिलने पर बेकसूर बाप बेटे को जाना पड़ गया जेल।