ऑपरेशन कामयाब... मगर मरीज मर गया!बरेली मंडल में बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठ रहे सवाल, अधिकारी बने मूकदर्शक

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी

बरेली।"ऑपरेशन कामयाब रहा... मगर मरीज मर गया!" - यह जुमला अब महज़ एक व्यंग्य नहीं, बल्कि बरेली मंडल की हकीकत बनता जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, भ्रष्टाचार और दलाल तंत्र के शिकंजे में जकड़ा पूरा सिस्टम मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहा है। सवाल उठता है-आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन?

 स्वास्थ्य सेवाओं में आधी-अधूरी व्यवस्था

मंडल के जिला अस्पतालों से लेकर प्राइवेट नर्सिंग होम्स तक हालात चिंताजनक हैं। जांच के दौरान हमारी टीम ने पाया कि मरीजों के इलाज से ज्यादा जोर कागज़ी औपचारिकताओं और कमाई के जुगाड़ पर है।
स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी या तो मौन धारण किए बैठे हैं या फिर सिस्टम की गड़बड़ियों पर आंख मूंदे हुए हैं।

 दलालों और बिचौलियों का कब्ज़ा

सूत्रों के अनुसार, अस्पतालों के पंजीकरण से लेकर एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, और पैथोलॉजी लैब के लाइसेंस तक—सब कुछ दलालों के जरिए कराया जा रहा है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पीलीभीत बायपास रोड स्थित एक अस्पताल का कर्मचारी पूरे बरेली मंडल में अस्पतालों के पंजीकरण के ठेके लेता है।
वही दलाल विभागीय एनओसी, फायर सेफ्टी, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी तक का इंतजाम कर देता है-वह भी तय रकम लेकर।

 भ्रष्टाचार का 'सिस्टमेटिक इलाज'

यह पूरा सिस्टम इतना मजबूत हो चुका है कि बिना "सेवा शुल्क" दिए कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। डॉक्टर, क्लर्क, और कुछ जिम्मेदार अधिकारी इस खेल के हिस्सेदार बन चुके हैं।
नतीजा-मानकहीन अस्पतालों का खुला संचालन, मरीजों की सुरक्षा से खिलवाड़ और जनता के टैक्स के पैसों की बर्बादी।

 जांच हुई तो हिल जाएगा विभाग

स्वास्थ्य विभाग के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि अगर इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो जाए, तो बरेली मंडल के कई बड़े अधिकारी बेनकाब हो जाएंगे।
मामला सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, मानव जीवन के साथ खिलवाड़ का है  जहां सिस्टम की लापरवाही हर दिन किसी न किसी मरीज की जान ले रही है।

 आखिर कब होगा 'इलाज' इस सिस्टम का?

सरकार की नीतियां और योजनाएं कागज़ों पर भले बेहतर दिखें, लेकिन ज़मीन पर उनका हाल किसी 'अस्पताल के स्टोररूम' से बेहतर नहीं।
अब सवाल ये है कि जब मरीज मर रहे हैं, दलाल पनप रहे हैं और अधिकारी चुप हैं-तो इस सड़ांध भरे सिस्टम का इलाज कौन करेगा?

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