यूजीसी का नया कानून शिक्षा के क्षेत्र में कितना घातक साबित होगा
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक नए मोड़ पर खड़ी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लाए जा रहे नए कानून और नीतिगत बदलावों ने देशभर के शिक्षाविदों, छात्रों और विश्वविद्यालयों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव शिक्षा को सशक्त करेगा या इसे पूरी तरह से “नियंत्रित” और “व्यावसायिक” बना देगा?
यूजीसी की नई रूपरेखा के तहत केंद्र सरकार को विश्वविद्यालयों की नीतियों, पाठ्यक्रमों, नियुक्तियों और मान्यता पर अधिक अधिकार मिलेंगे। यह व्यवस्था न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को सीमित करती है बल्कि शिक्षा को लोकतांत्रिक विमर्श से दूर कर एक केंद्रीकृत ढांचे में कैद कर देती है। जो विश्वविद्यालय अब तक अपनी स्थानीय और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार पाठ्यक्रम तय करते थे, वे अब केवल “निर्देशों” का पालन करने वाले संस्थान बन जाएंगे।
शिक्षा का व्यावसायीकरण और गिरती गुणवत्ता
यूजीसी के कानून का एक और बड़ा खतरा यह है कि यह उच्च शिक्षा को पूरी तरह बाज़ार के हवाले कर देता है। निजी विश्वविद्यालयों और विदेशी संस्थानों के लिए खुलते द्वार शिक्षा को “सामाजिक अधिकार” नहीं बल्कि “बेचे जाने वाला उत्पाद” बना रहे हैं। छात्र, शिक्षक और शोधकर्ता एक ऐसी व्यवस्था में फंस जाएंगे जहाँ ज्ञान नहीं, बल्कि लाभ प्रमुख होगा। ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र उच्च शिक्षा से धीरे-धीरे बाहर हो जाएंगे।
शिक्षक समुदाय पर असर
नई नीतियाँ अध्यापकों की स्वायत्तता को भी खत्म करती हैं। जहां पहले शिक्षक अकादमिक स्वतंत्रता के साथ शोध और आलोचनात्मक अध्ययन कर सकते थे, अब उन्हें केंद्र द्वारा निर्धारित ढाँचों में सीमित रहना होगा। नियुक्तियों में पारदर्शिता की जगह केंद्रीकरण बढ़ेगा और योग्यता से अधिक “अनुमति” का महत्व होगा।
संविधान की आत्मा पर प्रहार
भारतीय संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकारों और समान अवसरों के दायरे में रखा है। लेकिन यूजीसी का यह कानून उस आत्मा पर प्रहार करता है। यह राज्य की भूमिका को एक “नियामक” से बढ़ाकर “नियंत्रक” बना देता है। परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय अब विचार और संवाद के केंद्र न रहकर केवल आदेश पालन करने वाले संस्थान बन जाएंगे यह न केवल शिक्षा के लिए बल्कि लोकतंत्र के लिए भी घातक संकेत है।
यूजीसी का नया कानून अगर इसी रूप में लागू हुआ तो यह भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को गहराई से प्रभावित करेगा। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शिक्षकों की स्वतंत्रता और छात्रों के अधिकार सभी खतरे में पड़ जाएंगे। जरूरत है कि सरकार और शिक्षाविद इस विषय पर गंभीर विमर्श करें और ऐसी नीति बनाएं जो शिक्षा को नियंत्रण से नहीं, बल्कि संवाद और नवाचार से सशक्त बनाए।
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