यूजीसी कानून: मंडल से कमंडल तक का नया दौर-पिछड़ों को साधने की राजनीति या सत्ता बचाने की रणनीति?
रिपोर्ट मुस्तकीम मंसूरी
नई दिल्ली। देश की सियासत में जब-जब सामाजिक न्याय और आरक्षण की बहस तेज हुई है, तब-तब सत्ता के समीकरण बदले हैं। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर देश की राजनीति की दिशा बदल दी थी। उस दौर में भाजपा ने “कमंडल” के सहारे हिंदुत्व की राजनीति को धार दी और मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई से भारतीय राजनीति का चेहरा बदल गया।
अब एक बार फिर वही कहानी नए अंदाज़ में लौटती दिख रही है इस बार केंद्र में भाजपा सरकार के यूजीसी कानून के ज़रिए।
क्या है यूजीसी कानून और इसका उद्देश्य
सरकार का तर्क है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) में सुधार के नाम पर लाया गया यह नया कानून उच्च शिक्षा को “एकीकृत, पारदर्शी और राष्ट्रीय स्तर पर समान अवसर” वाला बनाएगा। नए प्रावधानों में शिक्षण संस्थानों की भर्ती प्रक्रिया, आरक्षण व्यवस्था, और नियुक्ति नियमों में केंद्रीय नियंत्रण बढ़ेगा।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे सिर्फ़ शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश मान रहे हैं।
भाजपा की ‘नई मंडल नीति’?
भाजपा लंबे समय तक “समान अवसर” और “मेरिट आधारित प्रणाली” की बात करती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में उसने ओबीसी, एससी, एसटी वर्गों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया है।
पिछले लोकसभा चुनावों से लेकर हालिया विधानसभा चुनावों तक भाजपा ने पिछड़े वर्गों को टिकट वितरण में बढ़त दी है। ऐसे में यूजीसी कानून को भाजपा का “सत्ता संतुलन” साधने का नया औजार माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह कानून भाजपा को उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ाने का राजनीतिक श्रेय दिला सकता है।
किसे होगा फायदा
ओबीसी, एससी, एसटी वर्ग:
यूजीसी के नए प्रावधानों से विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों में आरक्षण प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और केंद्रीकृत हो सकती है।
इससे इन वर्गों के युवाओं को अवसर बढ़ सकते हैं।
सरकार इसे “सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम” के रूप में प्रचारित करेगी।
सरकार और भाजपा
को सामाजिक संतुलन के नाम पर यह कदम भाजपा को पिछड़े वर्गों का राजनीतिक समर्थन दिला सकता है।
मंडल युग के विपरीत, अब भाजपा इस आंदोलन की “नायिका” बनकर उभरना चाहती है, न कि विरोधी दल की भूमिका में।
किसे होगा नुकसान
सवर्ण वर्ग या अपर कास्ट समुदाय:
उच्च शिक्षा और नौकरियों में अवसरों के सीमित होने की चिंता से इस वर्ग में असंतोष बढ़ सकता है।
खासकर शैक्षणिक पदों पर “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” की भावना हावी हो सकती है।
विपक्षी दल: कांग्रेस, सपा, राजद और अन्य दल, जो परंपरागत रूप से पिछड़े वर्गों की राजनीति करते रहे हैं, इस मुद्दे पर मौन हैं।
उनकी चुप्पी भाजपा को लाभ पहुँचा सकती है क्योंकि अब भाजपा सामाजिक न्याय की भाषा बोलने लगी है।
क्या शुरू होगा नया आंदोलन?
देशभर के विश्वविद्यालयों और छात्र संगठनों में इस कानून को लेकर हलचल शुरू हो चुकी है। शिक्षाविदों और छात्र नेताओं का कहना है कि यह कानून “संवैधानिक अधिकारों और स्वायत्तता” पर असर डाल सकता है।
अगर यह असंतोष बढ़ा, तो यह “शिक्षा बनाम सत्ता” की नई लड़ाई का रूप ले सकता है। जैसे 1990 में “मंडल बनाम कमंडल” था।
यूजीसी कानून सिर्फ शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति में एक नया अध्याय है।
जहां मंडल आयोग ने सामाजिक असमानता के खिलाफ़ लड़ाई को जन्म दिया था, वहीं यूजीसी कानून उस लड़ाई को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
फर्क सिर्फ इतना है कि अब “मंडल की राजनीति” को भाजपा ने अपने कमंडल में समेट लिया है।
Comments
Post a Comment