ओवैसी की राजनीति और सेक्युलर दलों की खोती ज़मीन

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

महाराष्ट्र के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की बढ़ती सफलता को केवल क्षेत्रीय या सामुदायिक प्रभाव मानना राजनीतिक भूल होगी। मुंबई जैसे महानगर से लेकर संभाजीनगर, मालेगांव, अमरावती और नांदेड़ तक AIMIM का उभार यह दर्शाता है कि भारतीय राजनीति में तथाकथित सेक्युलर दलों की साख गहराई से हिल चुकी है। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होते असंतोष और राजनीतिक उपेक्षा का परिणाम है।
महाराष्ट्र के 29 नगर निकाय चुनावों में AIMIM द्वारा लगभग 114 से 126 सीटों पर जीत इस बात का ठोस प्रमाण है कि पार्टी अब हाशिये की ताक़त नहीं रही। संभाजीनगर में 33, मालेगांव में 21, अमरावती में 15 और नांदेड़ में 12–13 सीटों पर जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक विकल्पों से आगे सोच रहा है। जहाँ 2017 में AIMIM की मौजूदगी सीमित थी, वहीं आज उसका तीन-अंकीय प्रदर्शन उसकी जनस्वीकृति का संकेत है।
मुंबई महानगरपालिका—देश का सबसे प्रभावशाली शहरी निकाय—में AIMIM की 8 सीटों पर जीत प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दूरगामी प्रभाव वाली है। यह सफलता कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और मनसे जैसे दलों से बेहतर प्रदर्शन का परिचायक है, जो दशकों से मुस्लिम राजनीति के स्वाभाविक प्रतिनिधि होने का दावा करते रहे हैं। जब कांग्रेस 24 सीटों तक सिमट जाती है और सेक्युलर दल प्रभावहीन नज़र आते हैं, तब यह प्रश्न उठना लाज़िमी है—क्या उनकी राजनीति में अब भी अल्पसंख्यकों के लिए कोई वास्तविक प्रतिबद्धता शेष है?
ओवैसी की राजनीति को केवल “पहचान की राजनीति” कहकर खारिज करना अधूरा विश्लेषण होगा। AIMIM की अपील पहचान से अधिक प्रतिनिधित्व की राजनीति है। बुलडोज़र कार्रवाइयों, मॉब लिंचिंग, नागरिक अधिकारों के उल्लंघन और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर जब सेक्युलर दलों का नेतृत्व मौन हो जाता है, तो एक राजनीतिक शून्य पैदा होता है—और ओवैसी उसी शून्य को भरते दिखाई देते हैं।
बिहार का सीमांचल क्षेत्र इस परिवर्तन की दूसरी अहम मिसाल है। 2025 के विधानसभा चुनावों में AIMIM ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 1.85 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया और 5–6 सीटों पर जीत दर्ज की। यह आंकड़ा भले ही छोटा दिखे, पर राजनीतिक प्रभाव बड़ा है। सीमांचल में AIMIM अब “वोट काटने वाली पार्टी” नहीं, बल्कि गठबंधनों की दिशा तय करने वाली शक्ति बन चुकी है। यह महागठबंधन जैसे सेक्युलर दावेदारों के लिए गंभीर चेतावनी है।
असल प्रश्न ओवैसी के उभार का नहीं, बल्कि सेक्युलर दलों की लगातार गिरती विश्वसनीयता का है। मुसलमानों को वर्षों तक “सुरक्षित वोट बैंक” मानने की राजनीति अब अप्रासंगिक हो चुकी है। जब प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक रह जाए और संकट के समय आवाज़ उठाने का साहस न दिखे, तो भरोसा टूटना स्वाभाविक है। ओवैसी की मुखरता—चाहे उससे असहमति हो—कम से कम यह एहसास कराती है कि कोई तो है जो खुलकर बोलता है।
AIMIM का उभार कट्टरता का पर्याय नहीं, बल्कि उपेक्षित समुदायों की राजनीतिक जागरूकता और आत्म-सम्मान की अभिव्यक्ति है। लोकतंत्र में जब स्थापित दल अपने दायित्व से पीछे हटते हैं, तो नई शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से उभरती हैं—और यही भारत की राजनीति में आज देखने को मिल रहा है।
महाराष्ट्र और बिहार के अनुभव मिलकर एक स्पष्ट संदेश देते हैं—
यदि सेक्युलर दल आत्ममंथन नहीं करते, अपने सिद्धांतों को पुनर्जीवित नहीं करते और संविधान तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा में निर्भीक भूमिका नहीं निभाते, तो उनका राजनीतिक आधार निरंतर क्षीण होता जाएगा। लोकतंत्र में कोई खाली जगह नहीं रहती; जो जगह छोड़ी जाती है, उसे कोई न कोई भरता ही है।
ओवैसी की पार्टी का उभार न तो केवल प्रतिक्रिया है, न किसी एक समुदाय तक सीमित घटना। यह भारतीय सेक्युलर राजनीति के लिए आईना है—जिसमें उसे अपनी कमजोरियाँ साफ दिखाई दे रही हैं। सवाल यह नहीं कि AIMIM कितनी आगे जाएगी, बल्कि यह है कि सेक्युलर दल इस चुनौती से क्या सबक लेते हैं। जो इस चेतावनी को अनसुना करेंगे, उनके लिए आने वाले समय में राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना कठिन होगा।

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