बसपा-कांग्रेस-एमआईएम का संभावित गठबंधन: उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की नई पटकथा?


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित रही है जहां जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण और नेतृत्व की छवि मिलकर चुनावी तस्वीर तय करते हैं। लेकिन अब सूबे की सियासत में एक नई हलचल है। चर्चा जोरों पर है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा), कांग्रेस, और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) एक साझा राजनीतिक मंच पर आने की संभावनाओं को तलाश रहे हैं। अगर यह गठबंधन आकार लेता है, तो यह निस्संदेह उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

तीन दल, तीन वोट बैंक,  एक साझा लक्ष्य

बसपा की परंपरागत पकड़ दलित वोट बैंक पर मानी जाती है, कांग्रेस का प्रभाव अब भी ऊपरी जातियों और ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में है, जबकि एमआईएम ने हाल के वर्षों में मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी पहचान मजबूत की है।
अगर ये तीनों दल एक साथ आते हैं, तो दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों का एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार हो सकता है। जो उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से सैकड़ों सीटों पर मुकाबले का समीकरण बदल देगा।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और मौजूदा परिदृश्य

बीजेपी की लगातार दो बार की प्रचंड जीत के बाद विपक्ष बिखरा हुआ और कमजोर दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी भले ही मुख्य विपक्षी दल हो, लेकिन वह अब तक हिंदू–मुस्लिम संतुलन और जातीय समीकरण के बीच एक ठोस वैकल्पिक नैरेटिव बनाने में विफल रही है।
ऐसे में अगर बसपा, कांग्रेस और एमआईएम जैसी पार्टियां एक साझा मोर्चा बनाती हैं, तो यह विपक्षी राजनीति में एक नई ऊर्जा और विकल्प की राजनीति को जन्म दे सकता है।

गठबंधन की चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि यह गठबंधन जितना संभावनाओं से भरा है, उतना ही पेचीदा भी। मायावती और कांग्रेस के बीच अतीत में कई बार गठबंधन की कोशिशें नाकाम रहीं हैं। वहीं, ओवैसी की एमआईएम को लेकर सेक्युलर दलों के भीतर भी संशय की स्थिति रही है।
गठबंधन तभी सार्थक होगा जब ये तीनों दल नेतृत्व, सीट बंटवारे और साझा एजेंडा पर स्पष्ट सहमति बना पाएं।
अगर यह गठबंधन हुआ  तो 2027 का चुनाव रोमांचक होगा
अगर यह राजनीतिक समीकरण वास्तविकता में बदलता है, तो बीजेपी और सपा दोनों के लिए यह गठबंधन सिरदर्द साबित हो सकता है।
दलित–मुस्लिम–कांग्रेस समर्थक वर्ग का मेल
उत्तर प्रदेश में एक नया सामाजिक समीकरण गढ़ सकता है, जो राज्य की राजनीति को दशकों तक प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर परिवर्तन की शुरुआत सामाजिक आधारों के नए मेल से होती है।
बसपा-कांग्रेस-एमआईएम का संभावित गठबंधन महज़ एक चुनावी प्रयोग नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ एक सामाजिक–राजनीतिक संदेश भी हो सकता है।
अब देखना यह होगा कि क्या यह गठबंधन सचमुच हकीकत बन पाता है या फिर यह चर्चा भी उत्तर प्रदेश की सियासत में एक और “अवसर चूक” बनकर रह जाएगी।

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