लोकतंत्र बिक्री पर है — क्या हम केवल दर्शक बनकर रह जाएंगे?
आज भारत का नागरिक एक असहज प्रश्न से जूझ रहा है—क्या उसका वोट अब भी स्वतंत्र है?
चुनाव से ठीक पहले खातों में पैसा डालना, योजनाओं का राजनीतिक उपयोग और सरकारी मशीनरी का खुला दुरुपयोग—ये सब संकेत देते हैं कि लोकतंत्र की आत्मा खतरे में है।
मैंने राष्ट्रवादी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते बिहार विधानसभा चुनाव का बहिष्कार किया था, क्योंकि मुझे लगा कि जब चुनाव की ज़मीन ही असमान कर दी जाए, तो मैदान में उतरना जनता के भरोसे के साथ छल होगा। लोककल्याण और वोट-प्रभावित करने में फर्क होता है। चुनाव से पहले “लॉलीपॉप” बाँटना कल्याण नहीं, बल्कि मतदाता की स्वतंत्र इच्छा को कमजोर करना है।
आज सवाल केवल बिहार या किसी एक राज्य का नहीं है। यह पूरे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था का सवाल है। अगर जीत का रास्ता धन-वितरण, प्रलोभन और दबाव से तय होगा, तो चुनाव का अर्थ ही क्या रह जाएगा? लोकतंत्र केवल मतदान नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और भरोसे की प्रक्रिया है।
इसी संदर्भ में माननीय सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा है कि वह स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव-पूर्व धन-वितरण और योजनाओं के दुरुपयोग पर स्पष्ट, कठोर और समान रूप से लागू होने वाले दिशा-निर्देश तय करे। निष्पक्ष चुनाव कोई कृपा नहीं, संवैधानिक अधिकार है।
एक और गंभीर प्रश्न चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का है। दुनिया के कई देशों ने माना है कि इलेक्ट्रॉनिक चुनाव प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञों और उद्योग जगत की प्रमुख आवाज़ों ने भी इस पर सार्वजनिक चिंता जताई है। जब संदेह गहरा है, तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में बैलेट पेपर जैसे पारदर्शी विकल्प पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं?
लोकतंत्र भरोसे पर चलता है। यदि जनता को प्रक्रिया पर भरोसा नहीं रहेगा, तो परिणाम चाहे जो हों, स्वीकार्यता नहीं बनेगी। इसलिए यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं, देश के भविष्य का है। सभी राष्ट्रीय दलों, संस्थाओं और नागरिकों को पार्टी हित से ऊपर उठकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट होना होगा।
आज ज़रूरत है शोर की नहीं, सुधार की। भाषणों की नहीं, नीतिगत फैसलों की। अगर हमने अभी सवाल नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे पूछेंगी—जब लोकतंत्र कमजोर हो रहा था, तब आप कहाँ थे?
लोकतंत्र बचाना है, तो चुनाव को निष्पक्ष बनाना होगा।
यही समय है—आज नहीं तो कभी नहीं।
लेखक:
अनिल भारती, एडवोकेट, समाजशास्त्री
राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रवादी जनता पार्टी (RJP)
मो.: 9312770383
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