शबे बरात: माफी, रहमत और तौबा की रात

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी

बरेली। मुफ्ती सलाउद्दीन अय्यूबी मस्जिद आला हज़रत मोहल्ला कानून गोयन बरेली ने शबे बरात के मौके पर कहा कि इस्लाम में कुछ रातें ऐसी होती हैं जो इंसान को अपने गुनाहों से पाक होने, तौबा करने और अल्लाह की रहमत हासिल करने का सुनहरा मौका देती हैं। इन्हीं मुबारक रातों में से एक है शबे बरात-यानी मग़फिरत की रात, रहमत की रात, तौबा की रात।

 शबे बरात का मतलब

अरबी में “बराअत” का अर्थ है “बरी होना” या “छुटकारा पाना”। इसलिए इस रात को “लैलतुल बराअत” यानी गुनाहों से छुटकारे की रात कहा जाता है। यह वह रात है जिसमें अल्लाह तआला अपने बंदों की तरफ रहमत की नज़र से देखता है और फरमाता है-
“क्या कोई है मुझसे माफी मांगने वाला कि मैं उसे माफ कर दूं?
क्या कोई है रोज़ी मांगने वाला कि मैं उसे रोज़ी दूं?
क्या कोई है मुसीबत में फंसा कि मैं उसे राहत दूं?”
(हदीस: इब्न माजह)

 तौबा और इस्तेग़फार की रात

शबे बरात हमें याद दिलाती है कि जिंदगी बहुत छोटी है, गुनाहों से तौबा का वक्त अभी है। इस रात का सबसे बड़ा सबक यही है कि हम अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हों, सच्चे दिल से इस्तेग़फार करें और अपने दिल को अल्लाह की तरफ मोड़ लें।
कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
“ऐ ईमान वालों! अल्लाह की तरफ सच्ची तौबा के साथ लौट आओ।”
(सूरा तहरीम: 8)

 इबादत और दुआ का एहतराम

इस रात में नमाज़, कुरआन की तिलावत, दरूद शरीफ़, ज़िक्र और दुआ में वक्त गुजारना बहुत अफज़ल है। कोई खास नमाज़ या रस्म इस्लाम में साबित नहीं, लेकिन नफ्ल इबादत, इस्तेग़फार, दुआ और रिश्तों में सुलह करना बेहतरीन अमल है।

 कब्रिस्तान की ज़ियारत

नबी ए करीम ﷺ ने इस रात जन्नतुल बक़ी (मदीना के कब्रिस्तान) की ज़ियारत की और अपने उम्मत के मरहूमीन के लिए दुआएं कीं। इसलिए शरई तरीके से अपने मरहूम रिश्तेदारों के लिए दुआ करना सुन्नत अमल है।

 गुनाहों से तौबा और लोगों से सुलह

शबे बरात की असली रूह यही है कि हम अल्लाह से माफी मांगें और इंसानों से भी अपने ताल्लुकात सुधारेँ।
अगर किसी से झगड़ा या मनमुटाव हो, तो उसे दूर करना इस रात की सबसे बड़ी इबादत है।
हज़रत अली (रज़ि.) फरमाते हैं:
“शबे बरात में न तो गुस्सा रखो, न नफरत  क्योंकि अल्लाह उस दिल में नहीं झांकता जिसमें दूसरों के लिए क़हर भरा हो।”

 फुज़ूल रस्मों से परहेज़

इस रात को रोशनी करना, मिठाई बाँटना या पटाखे फोड़ना इस्लाम का हिस्सा नहीं। यह रात इबादत और तौबा की है, न कि रसमों और दिखावे की। हमें चाहिए कि हम कुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ इस रात को जियें और अपने गुनाहों की माफी मांगें।

 अख़्तिताम

शबे बरात हमें याद दिलाती है कि अल्लाह तआला की रहमत बहुत बड़ी है। जो सच्चे दिल से झुकता है, उसे अल्लाह कभी मायूस नहीं करता।
आइए इस बरकत वाली रात में दिल से कहें 
“ऐ अल्लाह! हमें माफ़ कर दे, हमारे वालिदैन पर रहमत फरमा,
हमें सीधी राह पर चला और आख़िरत में अपना दीदार नसीब कर।”

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