2027 यूपी विधानसभा चुनाव: भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए सपा के साथ किन दलों का गठबंधन जरूरी?



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति 2027 विधानसभा चुनाव से पहले फिर से उफान पर है। एक तरफ भाजपा लगातार अपने संगठन, रणनीति और हिंदुत्व-राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जनता को साधने की तैयारी में जुटी है, तो दूसरी ओर विपक्ष सत्ता परिवर्तन की मजबूत पटकथा लिखने में लगा है।
सवाल यही है-भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ किन दलों का गठबंधन जरूरी होगा?

1-कांग्रेस: पारंपरिक वोट बैंक को सक्रिय करने की कुंजी

कांग्रेस भले ही पिछले दो चुनावों में यूपी में कमजोर दिखी हो, लेकिन उसके पास ब्राह्मण, मुस्लिम और अल्पसंख्यक वर्ग का पारंपरिक आधार अभी भी है।
अगर सपा-कांग्रेस में 2017 जैसी सीट एडजस्टमेंट और संयुक्त प्रचार रणनीति बनती है, तो भाजपा के शहरी और मध्यवर्गीय वोट बैंक में सेंध लग सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को 40–50 सीटों पर लाकर लड़ा जाए, तो विपक्ष का वोट बिखरने से बच सकता है।

2-आरएलडी (राष्ट्रीय लोक दल): पश्चिमी यूपी का जाट-मुस्लिम समीकरण

जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट और मुस्लिम एकता की सबसे बड़ी प्रतिनिधि है।
सपा और आरएलडी ने 2022 में जो गठबंधन किया था, उससे कई सीटों पर भाजपा को नुकसान हुआ था।
2027 में यदि यह गठबंधन बरकरार रहता है और इसे कांग्रेस व अन्य छोटे दलों का समर्थन मिलता है, तो पश्चिमी यूपी में भाजपा की मुश्किलें बढ़ना तय है।

3-एआईएमआईएम या मुस्लिम प्रतिनिधि दल वोटों का बिखराव रोकना

ओवैसी की एआईएमआईएम या प्रदेश के किसी स्थानीय मुस्लिम नेतृत्व वाले दल को साथ लाना भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट कर सकता है।
मुस्लिम मतदाता सपा के साथ तो हैं, लेकिन ओवैसी जैसे दलों को सम्मानजनक भूमिका देने से भाजपा के ध्रुवीकरण अभियान की धार कमजोर होगी।

4-बसपा या उसके टूटे गुट और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम): दलित समीकरण का जोड़

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की भूमिका इस चुनाव में निर्णायक रहेगी।
मायावती की पार्टी भले ही कमजोर हुई हो, परंतु दलित मतदाता (20% से अधिक) अभी भी उसकी रीढ़ हैं।
इसके साथ ही आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)-भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद की अगुवाई में दलित युवाओं और सामाजिक न्याय की नई राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रही है।
अगर सपा, बसपा के किसी प्रभावशाली धड़े और आजाद समाज पार्टी को “मिशन संविधान बचाओ-
सामाजिक न्याय लाओ” जैसे साझा एजेंडे पर साथ लाने में सफल होती है, तो दलित-मुस्लिम-ओबीसी वोटों का ऐतिहासिक गठजोड़ भाजपा के लिए सत्ता में वापसी बेहद कठिन बना देगा।

5- छोटे ओबीसी और क्षेत्रीय दल निर्णायक भूमिका में

अपना दल (कमेरावादी)  कुर्मी समुदाय में गहरी पकड़ रखता है।
निर्दलीय ओबीसी नेता, जैसे संजय निषाद या कुशवाहा गुट, अगर सपा के साथ जुड़ते हैं, तो भाजपा का पिछड़ा वर्ग समीकरण डगमगा सकता है।
सुभासपा (ओमप्रकाश राजभर) जैसे दल पूर्वांचल में राजभर वोट को सपा के पक्ष में मोड़ सकते हैं।

6-संयुक्त विपक्षी मोर्चा की रणनीति एक मुद्दा, एक चेहरा, एक मंच

भाजपा को मात देने के लिए विपक्ष को केवल सीट बंटवारे से आगे बढ़कर एक साझा एजेंडा और चेहरा सामने लाना होगा।
“संविधान और आरक्षण बचाओ”, “युवा रोजगार, किसान कर्जमाफी, कानून-व्यवस्था और महंगाई” जैसे ठोस मुद्दे ही जनता को एकजुट कर सकते हैं।
अगर अखिलेश यादव विपक्षी गठबंधन का चेहरा बनते हैं और कांग्रेस, आरएलडी, बसपा, आजाद समाज पार्टी सहित सभी दल एक सुर में प्रचार करते हैं, तो 2027 में यूपी में बड़ा राजनीतिक उलटफेर मुमकिन है।

समावेशी मोर्चा ही सत्ता परिवर्तन की कुंजी

2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्संतुलन का चुनाव होगा।
भाजपा को चुनौती देने के लिए सपा को कांग्रेस, आरएलडी, बसपा के किसी गुट, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम), राजभर और कुर्मी नेतृत्व वाले दलों के साथ मिलकर एक मजबूत “समावेशी मोर्चा” बनाना होगा।
अगर यह गठबंधन दलित-मुस्लिम-ओबीसी-ब्राह्मण-किसान समीकरण को एकजुट कर सका, तो उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की पटकथा तय मानी जाएगी।

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