रमज़ान की रूहानी रातें: तरावीह पढ़ना किसकी सुन्नत और कब शुरू हुई?

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

बरेली। मायरा हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉक्टर मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी ने रमज़ान की रूहानी रातों का जिक्र करते हुए कहा कि रमज़ान का महीना इबादत, रहमत और बरकत का पैग़ाम लेकर आता है। इस मुक़द्दस महीने की रातों को ज़िक्र, दुआ और सलात-उत-तरावीह (तराबी) से रौशन करना मुसलमानों की पुरानी रिवायत है। लेकिन बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि तरावीह पढ़ना किसकी सुन्नत है और यह इबादत कब से शुरू हुई।

 तरावीह-नबी ﷺ की मुहब्बत भरी सुन्नत

तरावीह दरअस्ल हज़रत मुहम्मद ﷺ की सुन्नत है। हदीस में आता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने रमज़ान की कुछ रातों में सहाबा किराम के साथ जमाअत में नमाज़ पढ़ाई, फिर कुछ रातें घर पर इन्फिराद पढ़ी। जब सहाबा ने इकट्ठा होना चाहा तो नबी ﷺ ने फ़रमाया:
“मुझे डर हुआ कि कहीं यह तुम पर फर्ज़ न कर दी जाए।”
(सहीह अल-बुख़ारी – किताब-उत-तहज्जुद)
इसलिए नबी ﷺ ने खुद इसे जमाअत के तौर पर हमेशा अदा नहीं किया, मगर यह उनकी मुहब्बत-भरी सुन्नत क़रार पाई।
 हज़रत उमर رضي الله عنه के दौर में तरावीह की जमाअत का एहतमाम
नबी ﷺ के इंतिकाल के बाद हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ رضي الله عنه के दौर में मुसलमान तरावीह अलग-अलग पढ़ते रहे। मगर जब हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब رضي الله عنه खलीफ़ा बने, तो उन्होंने लोगों को एक इमाम की इत्तेबा में इकट्ठा कर दिया। उस वक्त इमाम के तौर पर हज़रत उबै इब्न काब رضي الله عنه को मुक़र्रर किया गया।
हज़रत उमर رضي الله عنه ने यह हुक्म दिया और फरमाया:
“यह कितनी अच्छी बदअत (नवाचार) है।”
(सहीह अल-बुख़ारी – किताब-उत-तरावीह)
यानी उन्होंने नबी ﷺ की सुन्नत को फिर से ज़िंदा किया और उसे जमाअत की शक्ल में आम किया।
 कुरआन और हदीस की रोशनी में तरावीह का मक़सद
कुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“रात के कुछ हिस्से में नमाज़ (क़याम-उल-लैल) अदा करो, यह तुम्हारे लिए नफ़्ल है।”
(कुरआन, सूरह अल-इसरा 17:79)
तरावीह इसी क़याम का हिस्सा है जो रमज़ान की रातों में नूर और सुकून का सबब बनती है।

 आज की दुनिया में तरावीह का रूहानी असर

आज भी दुनिया भर के मुसलमान तरावीह की जमाअत से मस्जिदों को रौशन करते हैं। कुरआन की तिलावत और रात की नमाज़ें दिलों को नूर से भर देती हैं और इमानी ज़िंदगी में नयी रौनक पैदा करती हैं।
तरावीह पढ़ना हज़रत मुहम्मद ﷺ की सुन्नत और हज़रत उमर رضي الله عنه के दौर की जमाअत है। यह इबादत मुसलमानों को एकता, सब्र और रूहानी सुकून का पैग़ाम देती है।

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