रमज़ान के महीने में तीन अक्षरों ‘स’, ‘ब’ और ‘र’ का इस्लाम में गहरा महत्व
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
बरेली। सहारा सिटी हॉस्पिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉक्टर माजिद रज़ा क़ादरी ने रमज़ान के महीने में तीन अक्षरों 'स' 'ब' और 'र' का इस्लाम में गहरा महत्व है इस पर ख़ास जानकारी देते हुए बताया कि रमज़ान का महीना रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का महीना कहा गया है। यह महीना हर मोमिन के ईमान, सब्र और तक़वा की परीक्षा का समय होता है। इस पवित्र महीने में तीन अक्षर-‘स’, ‘ब’ और ‘र’-ऐसे हैं जो पूरे रमज़ान की रूह को बयान करते हैं।
डॉ माजिद रज़ा क़ादरी ने कहा कि इस्लामिक नज़रिए से ये तीनों अक्षर केवल शब्द नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन दर्शन हैं।
‘स’ - सियाम (रोज़ा) की पहचान
रमज़ान की शुरुआत ही ‘स’ यानी ‘सियाम’ से होती है। ‘सियाम’ का मतलब है रोज़ा रखना -यानी दिन भर खाने-पीने, बुरी बातों और गुनाहों से परहेज़ करना। कुरआन शरीफ़ में अल्लाह तआला फ़रमाता है-
“ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फर्ज़ किए गए जैसे तुमसे पहले लोगों पर किए गए थे ताकि तुम परहेज़गार बनो।”
(सूरह अल-बक़रह, आयत 183)
रोज़ा सिर्फ भूख और प्यास से रुकने का नाम नहीं, बल्कि अपनी रूह को पाक करने, अपनी नज़र और ज़ुबान को गुनाह से बचाने का अमल है।
‘ब’- बरकत और बख़्शिश
दूसरा अक्षर ‘ब’ यानी बरकत है। रमज़ान में अल्लाह की रहमतें ज़मीन पर उतरती हैं। इस महीने में हर नेक अमल का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।
रसूल-ए-पाक ﷺ ने फ़रमाया-
(हदीस — Sunan Ibn Majah)
बरकत सिर्फ माल या दौलत में नहीं, बल्कि ज़िंदगी, सेहत, रिश्तों और ईमान में भी होती है। रोज़ा रखने वाला इंसान अल्लाह की बरकतों से भरपूर होता है।
‘र’ — रज़ा और सब्र
तीसरा अक्षर ‘र’ यानी रज़ा और सब्र का प्रतीक है। रमज़ान सिखाता है कि इंसान अल्लाह की रज़ा (खुशी) के लिए हर मुश्किल को सब्र से झेलता है। भूख, प्यास, थकान-सब कुछ अल्लाह की खातिर बर्दाश्त करना सब्र की सबसे बड़ी मिसाल है।
कुरआन में अल्लाह फ़रमाता है-
“निश्चित ही सब्र करने वालों को उनका बदला बेहिसाब दिया जाएगा।”
(सूरह अज़-जुमर, आयत 10)
इस तरह रमज़ान का महीना हमें ‘स’ (सियाम), ‘ब’ (बरकत), और ‘र’ (रज़ा व सब्र) की तालीम देता है। यही तीन अक्षर हमें इंसानियत, तौबा और तक़वा के रास्ते पर चलते हुए अल्लाह के करीब ले जाते हैं।
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