मायावती से मायूसी, अखिलेश से उम्मीद-सपा में नसीमुद्दीन-फूल बाबू की नई इबारत”

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी

क्या अखिलेश यादव दिला पाएंगे बसपा जैसी हैसियत और  अहमियत?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में पुराने चेहरों की नई वापसी ने हलचल मचा दी है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी और अनीस अहमद ख़ान फूल बाबू के समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है-क्या इन्हें अखिलेश यादव की सपा में वही हैसियत और अहमियत मिलेगी जो इन्हें मायावती की बहुजन समाज पार्टी में हासिल थी?

बसपा में ऊँचा कद और असरदार भूमिका

नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की रीढ़ माने जाते थे।
वे कई बार मंत्री, प्रदेश प्रभारी और संगठन के अहम पदों पर रहे।
मायावती के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल नसीमुद्दीन ने पूर्वांचल में मुस्लिम वोटों को जोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
वहीं अनीस अहमद ख़ान फूल बाबू का प्रभाव पीलीभीत जिला, शाहजहांपुर जिला और तराई क्षेत्र तक फैला रहा।
बसपा शासनकाल में वे निचले स्तर से लेकर संगठन के मजबूत स्तंभ माने जाते थे।

कांग्रेस में नहीं मिला सियासी ठिकाना

बसपा से निष्कासन के बाद दोनों नेताओं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन थामा, लेकिन वहां इन्हें न तो जिम्मेदारी मिली और न संगठन में पकड़।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बाद इनका राजनीतिक वजूद लगभग हाशिये पर चला गया।
इसी ठहराव ने इन्हें सपा का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर किया।

सपा में नया समीकरण, नई उम्मीदें

सपा इस समय अपने मुस्लिम चेहरों के पुनर्संतुलन की प्रक्रिया में है।
आज़म ख़ान और उनके परिवार की सीमित सक्रियता के बीच नसीमुद्दीन जैसे अनुभवी मुस्लिम नेता का आना अखिलेश यादव के लिए एक रणनीतिक पूरक साबित हो सकता है।
अनीस अहमद ख़ान फूल बाबू भी हाजी रियाज अहमद का स्थानीय विकल्प बनकर पीलीभीत, बहेड़ी, खीरी और तराई क्षेत्र में मुस्लिम वोटों के नए ध्रुवीकरण में योगदान दे सकते हैं।

क्या सपा देगी “पुरानी पहचान” वाली भूमिका?

सपा के पास पहले से ही कई प्रभावशाली मुस्लिम चेहरे मौजूद हैं -जैसे एस. टी. हसन, इकबाल महमूद, और जावेद अब्बास आदि।
ऐसे में सिद्दीकी और फूल बाबू को वही संगठनात्मक ताकत देना आसान नहीं होगा जो बसपा में उन्हें मिली थी।
हालांकि, अगर अखिलेश यादव इन नेताओं को प्रचार, संगठन या अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में स्पष्ट ज़िम्मेदारी सौंपते हैं तो सपा मुस्लिम वोट बैंक के बड़े हिस्से पर पकड़ मज़बूत कर सकती है।

पूर्वांचल से लेकर पश्चिम तक असर की संभावनाएँ

राजनीतिक विश्लेषकों 
के अनुसार नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब भी पूर्वांचल में मुस्लिम और पिछड़े वर्गों पर प्रभाव रखते हैं।
अनीस अहमद ख़ान फूल बाबू तराई क्षेत्र में पुराने बसपाई वोटरों को सपा की ओर मोड़ सकते हैं।
अगर सपा इन दोनों को प्रमुख चेहरे के रूप में आगे करती है, तो आगामी 2027 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का बड़ा पुनर्संयोजन संभव है।

 अनुभव है, पर मंच की दरकार

दोनों नेताओं के पास अनुभव, जमीनी नेटवर्क और पहचान तीनों हैं, लेकिन सपा में उनकी राजनीतिक हैसियत का निर्धारण अखिलेश यादव की रणनीति पर निर्भर करेगा।
अगर सपा उन्हें निर्णायक भूमिका देती है तो यह कदम पार्टी के लिए राजनीतिक टर्निंग पॉइंट बन सकता है।
फिलहाल इतना तय है-
नसीमुद्दीन सिद्दीकी और फूल बाबू की एंट्री से सपा के मुस्लिम समीकरण में नई हलचल जरूर आ गई है।

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