30 रोज़ों की इबादत के बाद ईद-उल-फितर की खुशियां, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
समाजसेवी बाबू रज़ा ने कहा-रमज़ान सब्र, रहमत और जरूरतमंदों की मदद का महीना, ईद आपसी मोहब्बत और एकता का प्रतीक
बरेली। पवित्र रमज़ान माह में पूरे 30 रोज़ों की इबादत और परहेज़गारी के बाद मुस्लिम समुदाय ईद-उल-फितर का त्योहार बड़े हर्षोल्लास और अकीदत के साथ मनाता है। इस्लाम धर्म में रमज़ान का महीना सब्र, त्याग, आत्मसंयम और अल्लाह की इबादत का महीना माना जाता है, जिसमें रोज़ेदार सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोज़ा रखकर अल्लाह की बंदगी करते हैं।
समाजसेवी बाबू रज़ा ने कहा कि रमज़ान का पाक महीना इंसान को सब्र, रहमदिली और जरूरतमंदों की मदद करने की सीख देता है। उन्होंने बताया कि रमज़ान के पूरे रोज़े रखने के बाद चाँद दिखाई देने पर ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है, जो खुशियों, भाईचारे और मोहब्बत का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि ईद के दिन सुबह ईदगाह और मस्जिदों में विशेष नमाज़ अदा की जाती है। नमाज़ से पहले मुसलमानों के लिए ज़कात-उल-फितर अदा करना जरूरी होता है, ताकि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें।
बाबू रज़ा ने कहा कि ईद का त्योहार समाज में प्रेम, सौहार्द और भाईचारे को मजबूत करता है। इस दिन लोग नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं, ईद की मुबारकबाद देते हैं और अपने घरों में सेवइयां व मिठाइयां बनाकर खुशियां साझा करते हैं।
उन्होंने सभी लोगों से अपील की कि ईद के इस पावन अवसर पर आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम, भाईचारा और इंसानियत का संदेश फैलाएं, ताकि समाज में अमन और सद्भाव बना रहे।
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