सपा की ‘मुस्लिम अनदेखी’ बनेगी बसपा की जीत की कुंजी


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी

कैंट सीट पर नया सियासी संतुलन- दलित-मुस्लिम गठजोड़ बदल सकता है पूरा खेल

 वैश्य कार्ड फेल, अब सपा पर ‘मुस्लिम नाराज़गी’ का खतरा मंडराया

बरेली की 125 कैंट विधानसभा सीट पर इस बार का सियासी मुकाबला बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) की ओर से मुस्लिम चेहरे को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाना उसके पारंपरिक वोट बैंक में नाराज़गी का बड़ा कारण बनता जा रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने वैश्य समाज से प्रत्याशी उतारा था, लेकिन वैश्य वर्ग का बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ ही खड़ा रहा।
अब मुस्लिम समाज खुद को केवल “वोट बैंक” की तरह इस्तेमाल किए जाने से असंतुष्ट दिख रहा है, और यह असंतोष आने वाले चुनाव में सपा को भारी पड़ सकता है।

 बसपा ने साधा नया सामाजिक गणित  दलित-मुस्लिम गठबंधन से बदल सकता है समीकरण

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने हाल के वर्षों में दलित-मुस्लिम समीकरण को मज़बूत करने की दिशा में काम किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर बसपा इस सीट से किसी सशक्त मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, तो उसे दलित वर्ग के पारंपरिक वोटों के साथ मुस्लिम समाज का भी भरोसा मिल सकता है।
यह गठजोड़ इस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि कैंट सीट पर दोनों वर्गों की जनसंख्या मिलकर बड़ा राजनीतिक संतुलन तैयार करती है।

भाजपा संगठन और सपा रणनीति के बीच बसपा की ‘शांत चाल’ दे सकती है बड़ा सरप्राइज

भाजपा अपने मज़बूत संगठनात्मक ढांचे और सत्ता के सहारे चुनावी मैदान में है।
सपा के पास अनुभव तो है, लेकिन मुस्लिम समाज की बढ़ती नाराज़गी उसके लिए सिरदर्द बनती जा रही है।
इसी बीच बसपा बिना शोर-शराबे के “शांत रणनीति” के साथ आगे बढ़ रही है-जो चुनाव के अंतिम दौर में बड़ा उलटफेर कर सकती है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कैंट सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में बसपा “किंगमेकर” नहीं बल्कि “किंग” साबित हो सकती है।

मुस्लिम समाज अब ‘वोट बैंक’ नहीं, ‘निर्णायक मतदाता’ बनना चाहता है

मुस्लिम मतदाता अब खुद को सिर्फ समर्थन देने वाला वर्ग नहीं, बल्कि निर्णय तय करने वाला समुदाय मानने लगा है।
यदि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव एक बार फिर मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट देने से परहेज़ करते हैं, तो यह सपा के लिए बड़ा झटका साबित होगा।
वहीं, बसपा इस मौके को अपने पक्ष में भुनाने की पूरी तैयारी में है।
दलित और मुस्लिम समाज के बीच बढ़ती नज़दीकियाँ इस बार कैंट की सियासत का रुख पूरी तरह बदल सकती हैं।

 त्रिकोणीय जंग तय, सपा की राह सबसे कठिन

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस बार कैंट सीट पर त्रिकोणीय जंग तय है।
एक तरफ भाजपा का मजबूत संगठन, दूसरी तरफ सपा की कमजोर रणनीति और तीसरी ओर बसपा का उभरता गठजोड़-यह तीनों फैक्टर मिलकर 125 कैंट को प्रदेश की सबसे दिलचस्प सीट बना रहे हैं
125 कैंट विधानसभा का चुनाव अब केवल पार्टियों का नहीं, समीकरणों का युद्ध बन चुका है।
सपा की अनदेखी, बसपा की नई चाल और भाजपा की स्थायी पकड़-तीनों के बीच जो भी दल सामाजिक संतुलन साधने में सफल होगा, जीत उसी की झोली में जाएगी।
दलित-मुस्लिम एकता का यह फार्मूला अगर जमीन पर उतरा, तो 125 कैंट में बसपा “तीसरा विकल्प” नहीं बल्कि “पहली पसंद” बनकर उभर सकती है।

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