एक ही संस्था के खिलाफ बार-बार खबरें छापना: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या अधिकारों का हनन?



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

प्रेस की आज़ादी और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बीच संतुलन पर उठे सवाल

लखनऊ। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में संरक्षित किया गया है। लेकिन जब किसी एक अस्पताल, सरकारी विभाग या सामाजिक संगठन के खिलाफ एक ही अखबार में बार-बार नकारात्मक खबरें प्रकाशित की जाती हैं, तो यह सवाल खड़ा होता है कि क्या यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता है या फिर किसी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास?
संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(2) के तहत इस स्वतंत्रता पर “मानहानि”, “लोक व्यवस्था” और “नैतिकता” जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यदि किसी संस्था के खिलाफ लगातार बिना ठोस प्रमाण के खबरें प्रकाशित की जाती हैं, तो यह मानहानि (Defamation) के दायरे में आ सकता है, जो कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 499 और 500 के तहत दंडनीय अपराध है।
वहीं, प्रेस से जुड़े आचार-व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं, जिनमें निष्पक्षता, तथ्यों की पुष्टि और संतुलित रिपोर्टिंग को अनिवार्य बताया गया है। किसी एक पक्ष के खिलाफ लगातार खबरें छापना इन मानकों का उल्लंघन माना जा सकता है, खासकर तब जब संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर न दिया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई मीडिया संस्थान किसी विशेष संस्था को टारगेट कर बार-बार खबरें प्रकाशित करता है, तो प्रभावित पक्ष अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग कर सकता है। अदालत ऐसे मामलों में मीडिया की स्वतंत्रता और व्यक्ति/संस्था की प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने का काम करती है।
इस संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित में सूचना देना है, न कि किसी विशेष एजेंडे के तहत किसी संस्था की छवि को बार-बार नुकसान पहुंचाना। निष्पक्ष, संतुलित और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग ही एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
एक ही संस्था के खिलाफ बार-बार खबरें प्रकाशित करना तब तक उचित माना जा सकता है, जब तक वह तथ्यात्मक, जनहित में और संतुलित हो। अन्यथा यह न केवल संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन हो सकता है, बल्कि कानूनी कार्रवाई का आधार भी बन सकता है।

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