ज़कात और फितरा इस्लाम की सामाजिक बराबरी की बेहतरीन व्यवस्था: डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

जरूरतमंदों की मदद और समाज में भाईचारे को मजबूत करने का संदेश देता है ज़कात और फितरा

बरेली। रमज़ान का पवित्र महीना इंसानियत, रहमत और गरीबों की मदद का पैगाम लेकर आता है। इस अवसर पर मायरा हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी ने ज़कात और सदक़ा-ए-फितर के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस्लाम में ज़कात और फितरा केवल इबादत नहीं बल्कि समाज में आर्थिक संतुलन और इंसानियत को मजबूत करने की महान व्यवस्था है।
डॉ. अंसारी ने कहा कि इस्लाम के पाँच स्तंभों में ज़कात को विशेष स्थान दिया गया है। जो मुसलमान आर्थिक रूप से सक्षम है, उस पर अपनी संपत्ति का ढाई प्रतिशत हिस्सा ज़कात के रूप में देना फर्ज़ है। ज़कात देने से माल में बरकत आती है और समाज में गरीबों तथा जरूरतमंदों की मदद होती है।
उन्होंने कहा कि रमज़ान के महीने में फितरा अदा करना भी बेहद अहम है। फितरा का उद्देश्य यह है कि ईद-उल-फितर की खुशी में कोई भी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति शामिल होने से वंचित न रह जाए। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह ईद की नमाज़ से पहले फितरा अदा करे ताकि जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें।
डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी ने बताया कि ज़कात और फितरा की रकम का इस्तेमाल गरीबों, बेसहारों, अनाथों, विधवाओं, कर्ज़दारों, बीमारों और जरूरतमंद छात्रों की मदद के लिए किया जाना चाहिए। इसके साथ ही गरीबों के इलाज, शिक्षा और भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में भी ज़कात की राशि खर्च की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि अगर समाज के सक्षम लोग ईमानदारी से ज़कात और फितरा अदा करें तो समाज से गरीबी और भूख जैसी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस्लाम इंसानियत, बराबरी और भाईचारे का संदेश देता है और ज़कात व फितरा उसी व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।
डॉ. अंसारी ने सभी लोगों से अपील की कि रमज़ान के इस मुबारक महीने में ज्यादा से ज्यादा गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करें ताकि समाज में आपसी प्रेम, भाईचारा और इंसानियत की भावना मजबूत हो सके।

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