ईरान के नेता की हत्या पर सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना है


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

भारत की विदेश नीति का मौन अब सवालों के घेरे में—क्या हमने अपने ही सिद्धांतों से दूरी बना ली है?

हत्या से बड़ा सवाल  भारत की खामोशी क्यों?

1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह सैयद अली हुसैनी खामेनेई की हत्या अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए लक्षित हमलों में हुई।
एक राष्ट्राध्यक्ष की हत्या, वह भी अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के दौरान, न केवल विश्व शांति बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती है।
लेकिन इस दुखद घटना से भी अधिक चौंकाने वाली बात है—भारत सरकार की चुप्पी।

चुप्पी का अर्थ—सिद्धांतों से विचलन

भारत सरकार ने इस हत्या की निंदा नहीं की और न ही इसे संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में देखा।
प्रधानमंत्री ने केवल यूएई पर ईरान के प्रतिशोधी हमलों पर चिंता जताई, मगर इज़राइल द्वारा की गई कार्रवाई पर एक शब्द नहीं कहा।
उन्होंने “संवाद और कूटनीति” की बात तो की, लेकिन यह नहीं बताया कि जब इज़राइल लगातार हवाई हमले कर रहा था, तब भारत का रुख क्या था।
जब किसी देश के नेता की हत्या जैसी घटना को अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाता, तो यह हमारी विदेश नीति की नैतिक कमजोरी को उजागर करता है।

वैश्विक दक्षिण की आवाज़ से भारत क्यों दूर हुआ?

आज जब Global South के कई देश—रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और चीन—इस हत्या की खुलकर निंदा कर चुके हैं, भारत की चुप्पी उसके नैतिक नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
भारत हमेशा से उन देशों में रहा है जो अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और न्याय के सिद्धांतों की वकालत करते रहे हैं।
लेकिन आज जब उसी सिद्धांत की परीक्षा हुई, तो भारत मौन रहा।

भारत-इज़राइल रिश्ते महत्वपूर्ण, पर सिद्धांतों से ऊपर नहीं

पिछले कुछ वर्षों में भारत और इज़राइल के बीच रक्षा, कृषि और तकनीक जैसे क्षेत्रों में रिश्ते मज़बूत हुए हैं।
यह संबंध भारत के हित में हैं, लेकिन इन रिश्तों की स्थिरता विश्वसनीयता और संतुलन पर निर्भर करती है।
अगर भारत ऐसी घटनाओं पर चुप रहता है, तो वह न केवल अपने नैतिक मूल्यों से बल्कि अपनी रणनीतिक साख से भी समझौता करता है।

संप्रभुता पर दोहरा मापदंड नहीं चलेगा

भारत की विदेश नीति हमेशा संप्रभुता, कानून और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित रही है।
जब हम इन्हीं सिद्धांतों पर चुप्पी साध लेते हैं, तो यह केवल नैतिक पराजय नहीं बल्कि राजनयिक पराजय भी होती है।
अगर आज हम किसी और की भूमि की संप्रभुता की रक्षा पर नहीं बोलेंगे, तो कल जब हमारी सीमाओं पर ऐसा होगा, तो कौन हमारी बात सुनेगा?

खाड़ी देशों में भारत का हित

भारत के 1 करोड़ से अधिक नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं।
ईरान, सीरिया और यमन जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता सीधे हमारे नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी है।
इसलिए यह मुद्दा केवल सिद्धांत का नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता का भी है।
शांति और स्थिरता भारत के हित में हैं।

भारत को अपने मूल स्वरूप में लौटना होगा

भारत को अपनी स्वतंत्र और सशक्त विदेश नीति की उस परंपरा में लौटना चाहिए,
जो कभी किसी गुट के दबाव में नहीं झुकी,
बल्कि न्याय, संवाद और विश्व शांति की पक्षधर रही।
भारत की आवाज़ विश्व में हमेशा संतुलन और न्याय की प्रतीक रही है 
उसी परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

 लेखिका:
सोनिया गांधी
अध्यक्ष, कांग्रेस संसदीय दल एवं राज्यसभा सदस्य

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