ईद खुशियों का त्योहार, इसे सियासत या ग़म का दिन न बनाएं – मुस्तकीम मंसूरी



कुरआन और इस्लामी तालीमात की रोशनी में अमन, भाईचारे और वतन से मोहब्बत का पैगाम

बरेली। अखिल भारतीय मंसूरी समाज के सूबाई सदर मुस्तकीम मंसूरी ने ईद-उल-फितर के मौके पर मुस्लिम समाज को अहम पैगाम देते हुए कहा है कि ईद खुशियों, शुक्र और आपसी मोहब्बत का त्योहार है, इसे किसी भी तरह के ग़म या सियासी एहतिजाज़ का दिन नहीं बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि रमज़ान के पूरे महीने की इबादत के बाद अल्लाह तआला ने ईद का दिन खुशी और शुक्र अदा करने के लिए मुक़र्रर फरमाया है। कुरआन-ए-पाक में भी रोज़ों के मुकम्मल होने पर खुशी जाहिर करने और अल्लाह का शुक्र अदा करने का हुक्म दिया गया है। ऐसे में ईद के दिन काली पट्टी बांधकर ग़म या एहतिजाज़ करना इस्लामी तालीमात के मुताबिक दुरुस्त नहीं माना जा सकता।
मुस्तकीम मंसूरी ने कहा कि Prophet Muhammad ने भी ईद के दिन खुशियां मनाने, आपस में मेल-जोल बढ़ाने और समाज में मोहब्बत आम करने की ताकीद फरमाई है। इस दिन किसी भी तरह का मातम या ग़म मनाना ईद की असल रूह के खिलाफ है।
उन्होंने आगे कहा कि इस्लाम इंसानियत, अमन और एतदाल (संतुलन) का दीन है। दुनिया के किसी भी हिस्से में हो रहे जुल्म के खिलाफ हमदर्दी रखना एक नेक अमल है, लेकिन उसके इज़हार का तरीका और वक्त भी उतना ही अहम होता है। ईद जैसे मुकद्दस दिन को एहतिजाज़ या ग़म में बदलना मुनासिब नहीं है।
सूबाई सदर ने “मादरे वतन” की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि अपने मुल्क से मोहब्बत करना हर मुसलमान का फर्ज है। Prophet Muhammad को भी अपने वतन से गहरा लगाव था, जो हमें यह दर्स देता है कि अपने मुल्क की तरक्की, अमन और यकजहती (एकता) के लिए काम करना हमारी जिम्मेदारी है।
मुस्तकीम मंसूरी ने मुस्लिम समाज से अपील की कि ईद के दिन अल्लाह का शुक्र अदा करें, ग़रीबों और जरूरतमंदों की मदद करें, आपसी भाईचारा बढ़ाएं और मुल्क में अमन-ओ-अमान का पैगाम आम करें।
उन्होंने कहा कि ईद का असली मकसद मोहब्बत, इंसानियत और यकजहती को मज़बूत करना है, लिहाज़ा तमाम लोग इसे खुशी और जिम्मेदारी के साथ मनाएं।

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