चमकते सितारे अमर शहीद क्रांतिकारी राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह
मुनेश त्यागी
स्याह रात में रोशन किताब छोड़ गए
वो चले गए मगर अपने ख्वाब छोड़ गए,
हजार जब्र हों मगर ये फैसला है अटल
वो जहन-जहन में इंकलाब छोड़ गए।
हमारे क्रांतिकारी राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के प्रकाश स्तंभ और सबसे चमकते हुए सितारे हैं। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अप्रत्याशित तेज गति मोहिया कराई। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई थी। सुखदेव लायलपुर पंजाब से थे। वे बहुत बड़े संगठन कर्ता थे और मौके के अनुसार सर्वोत्तम का प्रयोग करना जानते थे। उनका कहना था कि हमारे दल का मकसद देश में समाजवादी प्रजातांत्रिक प्रणाली स्थापित करना है।
राजगुरु महाराष्ट्र के थे। वे अपने तमाम साथियों में सबसे ज्यादा निडर क्रांतिकारी थे। उनका मानना था कि दुनिया से भाग कर इस दुनिया को नहीं बदला जा सकता। देश के लिए प्राणों की आहुति देने में उनकी भगत सिंह से होड लगी हुई थी। उनका मानना था कि मैं भगत सिंह से पहले मारूंगा। कमाल की बात देखिए कि आपसी सहमति के अनुसार, राजगुरु ही भगत सिंह से पहले फांसी के फंदे पर लटके थे। वे संघर्षों में सबसे आगे रहते थे। समाजवाद में उनका पूरा विश्वास था। उनका मानना था कि समाजवाद का रास्ता ही देश के कल्याणकारी भविष्य का रास्ता है। वे समाजवाद के दीवाने थे। राजगुरु देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान देना, अपना सबसे बड़ा सौभाग्य समझते थे। उनका मानना था कि हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है और प्यार का अभाव है।
अपने समय के सबसे अग्रणी क्रांतिकारी भगत सिंह बंगा लायलपुर पंजाब के थे। उनका परिवार आजादी के आंदोलन में पहले से ही भाग ले रहा था। उनके चाचा और पिताजी जेल में बंद रहे थे। आजादी की विरासत की घुट्टी भगत सिंह को अपने परिवार से ही मिली थी। भगत सिंह पढ़ने के सबसे बड़े शौकीन थे। उन्होंने उस समय देश में फैले शोषण, दरिद्रता और असमानता का गंभीर अध्ययन किया। उनका मानना था कि संगठन और प्रचार, क्रांति के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं। वे सिर्फ आजादी ही नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आजादी के सबसे बड़े समर्थक थे।
भगतसिंह मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक देश द्वारा दूसरे देश के शोषण के सबसे बड़े विरोधी थे। वे क्रांति के सबसे बड़े प्रचारक थे। वे वाणी और लेखनी के धनी थे। उनका मानना था कि सामाजिक और आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी का के कोई मायने नहीं है। वे समाजवाद के सबसे बड़े समर्थक थे। समाजवाद की आवाज को सबसे ज्यादा गौर से भगत सिंह ने सुना और समाजवादी समाज और समाजवादी राजसत्ता की बात की। किसानों मजदूरों का राज्य कायम करना उनका सबसे बड़ा लक्ष्य था।
भगत सिंह के आने के बाद संगठन का जनवादीकरण हुआ। भगत सिंह की पहल पर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन किया गया था जिसके पहले सेनापति चंद्रशेखर आजाद चुने गए थे और भगत सिंह को उसका प्रचार मंत्री बनाया गया था। उनका उद्देश्य समस्त मानवता को सुखी बनाना था। उन्होंने अदालत को राजनीतिक प्रचार प्रसार का माध्यम बनाया। क्रांति से उनका मतलब था मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का खात्मा। वे विवाद विवादों में उत्तेजित नहीं होते थे।
भगतसिंह का मानना था कि शोषकों को खत्म करके यह दुनिया हमें स्वर्ग बनानी है। उन्होंने भगवान और धर्म की निरर्थकता पर सवाल उठाए और धर्म को राजनीति से अलग करने की बात की और वे धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े पक्षधर थे। उनका मानना था कि मेरा धर्म इस धरती को स्वर्ग बनाना है। उन्होंने नौजवानों को मुक्ति के राही बताया। उन्होंने लोगों को जगाया और सुसंगठित होना सिखाया। हमारे शहीदों ने समाज में फैली मायूसी और लाचारी को दूर किया, खोए हुए आत्मविश्वास को जगाया। वे समाज में फैली ऊंच-नीच और छोटे बड़े की सोच का खात्मा करना चाहते थे और समाज के क्रांतिकारी समाजवादी रूपांतरण के सबसे बड़े हामी थे।
भगत सिंह ने जेल कोठरी को अपना अध्ययन कक्ष बना लिया था और यहीं पर उन्होंने 300 से अधिक पुस्तक जेल के अंदर ही पढी थीं। उन्होंने जेल में देश और दुनिया के 67 लेखकों का अध्ययन किया, उन्हें पढ़ा। उनके प्रिय लेखक ह्यूगो, गौर्की, तुर्गनेव, स्ट्रैंड रसेल, टैगोर, उमर खय्याम, सिंक्लेयर, चार्ल्स डिकेंस, मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन थे। जब भगत सिंह को फांसी के लिए ले जाया गया तो उन्होंने जेल कर्मियों से कहा था कि "ठहरो, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है" उस समय भगतसिंह रूस की क्रांति के महान नायक लेनिन की जीवनी पढ रहे थे।
भगत सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे "किताबी कीड़े" यानी "बुक एल्कोहलिक" थे। वे एक कुशल वक्ता और कलम के धनी थे। हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। अपने विचारों का प्रचार प्रसार करने के लिए उन्होंने प्रताप, प्रभा, महारथी और चांद अखबारों में लिखा। भगत सिंह एक बहुत बड़े लेखक थे। क्रांतिकारियों द्वारा लिखे गए 139 में से 97 लेख भगत सिंह ने लिखे थे। भगत सिंह एक बड़े लेखक थे। उन्होंने पांच किताबें लिखी थीं ,,,1.समाजवाद का आदर्श, 2.मृत्यु के द्वार, 3.आत्मकथा, 4.भारत में क्रांतिकारी आंदोलन और 5.मैं नास्तिक क्यों?
यहां पर सवाल उठता है कि हमारे क्रांतिकारियों ने क्या किया। उनके द्वारा किए गए कामों की सूची बहुत लंबी है,,,, जैसे उन्होंने 1. पूर्ण मुक्ति का उद्घोष किया, 2.क्रांति की व्याख्या की, 3.अपने दल का नाम भारतीय समाजवादी गणतंत्र संघ रखा, 4.उनका लक्ष्य समाजवादी समाज कायम करना था, 5.उन्होंने क्रांति के लिए किसानों मजदूरों को संगठित करने का आह्वान किया, 6.क्रांति की यथार्थवादी वैज्ञानिक अवधारणा स्थापित की। 7.उनका कहना था कि हमारी क्रांति और हमारा क्रांतिकारी युद्ध शोषण, गैर बराबरी भेदभाव और अन्याय के खात्मे तक जारी रहेगा।
8.उन्होंने बताया कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद सारे युद्धों की जड़ हैं और शोषक वर्ग व्यवस्था के खात्मे तक देश में चिरशांति कायम नहीं हो सकती। 9.उन्होंने तार्किकता और विवेक संपन्न मानवीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया। 10.भगतसिंह ने ईश्वर और धर्म का तार्किक खंडन किया। 11.उन्होंने बताया कि ईश्वर और धर्म, शोषण शासक लोगों द्वारा अपने शोषण को बरकरार रखने के औजार हैं और 12.शोषक शासक वर्ग ही, इस संसार की समस्याओं के लिए जिम्मेदार हैं।
भगत सिंह ने अपने जीवन में मार्क्स और एंगेल्स को पढ़ा। उन्हें लेनिन से सबसे ज्यादा लगाव था। उनका मानना था कि व्यक्तित्व के विकास के लिए गहन अध्ययन की जरूरत है और पूंजीवाद के रहते कोई समानता स्थापित नहीं हो सकती। पूंजीवादी प्रजातंत्र प्रत्येक व्यक्ति के समान अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता और यहां सिर्फ पूंजीवादियों के लिए जनतंत्र है, जनता के हितों की हिफाजत के लिए नही। पूंजीवादी समाज में राज सत्ता का प्रयोग अपने विरोधियों को दबाने के लिए किया जाता है।
कमाल की सोच देखिए,,,हमारे तमाम शहीद कैसा देश और समाज चाहते थे, देखिए जरा,,,,,
वे तो वे नजारे देखे थे
जहां न भूख हो, न नग्नता हो,
जहां न गरीबी हो, न अमीरी हो,
जहां न जुल्म हों, न अन्याय हो,
जहां बस प्रेम हो, एकता हो,
इंसाफ हो, आजादी हो,
जहां बस सुंदरता हो।
उनके नारे भी कमाल के थे जैसे,,, 1. समाजवादी क्रांति अमर रहे, 2.कम्युनिस्ट इंटरनेशनल अमर रहे, 3.लेनिन जिंदाबाद, 4.साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, 5.इंकलाब जिंदाबाद, 6. सर्वहारा क्रांति जिंदाबाद और 8.समाजवादी क्रांति जिंदाबाद। हमारे ये क्रांतिकारी जब अदालत में आते थे तो इन्हीं नारों को लगाते हुए अदालत में आते थे। शहीदों के इन नारों से अदालत के जजों को चिढ़ हो गई थी। अंग्रेजी अदालत भगत सिंह का हौसला तोड़ना चाहती थी। इसी मंसूबे के तहत अदालत में भगत सिंह को भरी अदालत में सार्वजनिक रूप से पत्रकारों के सामने जूतों और लाठियों से पीटा गया, उनकी बेज्जती की गई। भगत सिंह के साथियों ने अदालत के इस मनमाने अत्याचार का खुलकर विरोध किया था।
शाहिदे आजम भगत सिंह ने धर्म के बारे में कहा था कि "धर्म राजनीति से अलग है। धर्म व्यक्ति का निजी मामला है, इसे राजनीति में नहीं घुसना चाहिए। " क्रांति के बारे में भगत सिंह ने कहा था कि "क्रांति जनता द्वारा, जनता के हित में। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रांति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर देगी। क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन। क्रांति मानव जाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। हमारे इंकलाब का अर्थ है पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत कर देना। हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के पक्ष में हैं।"
"हम शाश्वत और वास्तविक क्रांति चाहते हैं जिसका आधार न्याय और समानता होगी। क्रांति तो केवल सतत कार्य करने से, कष्ट सहन करने से एवं बलिदानों के द्वारा ही उत्पन्न की जा सकती है।" उन्होंने यह भी कहा था कि "हमें समाजवादी मूल्यों पर आधारित किसानों मजदूरों की सरकार और सत्ता की जरूरत है। गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद भूरे लोगों की सत्ता और सरकार बनने से जनता को कोई फायदा नहीं होगा। आजादी के 79 साल के बाद, भगत सिंह की यह बात आज भी सही है।
क्रांति के बारे में भगतसिंह ने जोर देकर कहा था कि "नौजवानों को क्रांति का संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचना है, कारखानों में, गंदी बस्तियों में, गांव की जर्जर झोपड़िया में रहने वाले करोड़ों किसानों मजदूरों में क्रांति की अलख जगानी है जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण करना संभव हो जाएगा। भारत के नौजवानों तुम्हारा मिशन बहुत ही नेक है, देश के हर कौने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रांति के लिए लोगों को तैयार करो। हमारी क्रांति मजदूर तथा किसानों का राज्य काम करेगी।" "इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है।" और "क्रांतिकारी साहित्य जनता की भाषा में आम हो।"
उन्होंने आगे कहा कि "क्रांति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी। हमारी परिभाषा के अनुसार इंकलाब का अर्थ मौजूदा सामाजिक ढांचे में पूर्ण परिवर्तन करना और समाजवाद की स्थापना करना है। हमारा आदर्श है नये ढंग की सामाजिक संरचना यानी मार्क्सवादी ढंग से हम समाजवादी क्रांति चाहते हैं। क्रांति के लिए प्रशिक्षित नौजवानों, मजदूरों और किसानों की पार्टी की जरूरत होगी, जो लोगों को जोड़ने का काम करेगी और पार्टी का नाम "कम्युनिस्ट पार्टी" होगा।"
हमारे इन शहीदों की सोच का कमाल देखिए,,,,,फांसी लगने से पहले हमारे इन महान शहीदों ने अंग्रेजी सरकार को पत्र लिखकर मांग की थी कि "हम युद्धबंदी हैं। हमारे साथ युद्धबंदियों जैसा व्यवहार किया जाए और हमें फांसी के बदले गोली से उड़ा दिया जाए।" कितना बड़ा और बुनियादी फर्क है हमारे क्रांतिकारी और हिंदुत्ववादी सावरकर में जो जेल से छूटने के लिए अंग्रेजों से लगातार माफी मांगता रहा!!
जब भगत सिंह का अपमान करने और उनका हौसला तोड़ने के लिए जब अंग्रेजों ने भगत सिंह के साथ मारपीट की थी तो अंग्रेज जजों की इस मनमानी कार्रवाई से नाराज होकर जस्टिस आगा हैदर ने उसे दिन अदालत की कार्यवाही पर दस्तखत करने से मना कर दिया था और अपने जज के पद से इस्तीफा दे दिया था। मगर अंग्रेज़ सरकार ने जनता में हिंदू मुस्लिम नफरत का जहर फैलाने के लिए, अब्दुल कादिर की नये जज के रूप में नियुक्ति की।
यहीं पर अहम सवाल उठता है कि आखिर अदालत ने हमारे इन शहीदों को जान पूछ कर फांसी की सजा क्यों दी? इसका मुख्य कारण था कि हमारे शहीदों में सुखदेव सबसे बड़े संगठन कर्ता और समाजवादी विचारधारा के बहुत बड़े समर्थक थे। राजगुरु सबसे ज्यादा निर्भीक और मौत को हराने वाले थे और समाजवादी विचारधारा और किसानों मजदूरों की सरकार की स्थापना में विश्वास रखते थे और भगत सिंह एक राजनीतिक समाजवादी साम्यवादी विचारक, क्रांतिकारी लेखक, नेता, उच्च कोटि के विद्वान, महान लेखक और बहुत बडे वक्ता और भाषणकर्ता थे। जजों का कहना था कि अगर इन्हें जिंदा छोड़ गया तो ये फिर समाज में जाकर, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब जिंदाबाद और समाजवाद जिंदाबाद करेंगे। इसी क्रांति विरोधी और साम्राज्यवादी मंसूबे के तहत, उन बेईमान अंग्रेज जजों ने हमारे इन महान क्रांतिकारी शहीदों को फांसी की सजा दी थी।
मगर हमारे इन महान क्रांतिकारियों ने मौत की परवाह नहीं की और वे समाजवादी क्रांति और आजादी का झंडा बुलंद करते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए और इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करते हुए भारत भूमि का सिर दुनिया में ऊंचा कर गए। आज यह बेहद अफसोस की बात है कि आज हम जो भारत की दुर्दशा देख रहे हैं वह हमारे शहीदों के सपनों का भारत नहीं है। यहां की जनता आज भी शोषण, जुल्म, अन्याय, गैर बराबरी, भाईभतीजावाद, सांप्रदायिकता, धर्मांता और पूंजीवाद साम्राज्यवाद की भयंकर लूट की नीतियों का शिकार है। सरकार द्वारा किसानों को आज भी उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं दिया जा रहा है और मजदूरों को नए कानूनों के तहत आधुनिक गुलाम बनाने की साजिश की जा रही है।
यह हमारे शहीदों के सपनों का भारत नहीं है। आज यह और भी ज्यादा जरूरी हो गया है कि हम अपने शहीदों के बताए रास्ते पर चलें और उनके द्वारा सुझाए गए भारत का निर्माण करें, यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम अपने स्वतंत्रता सेनानी ताऊजियों ओमप्रकाश त्यागी और प्रणाम सिंह त्यागी द्वारा अपने इन शहीदों की याद में बारम्बार गाये गये गीत के माध्यम से अपने क्रांतिकारी शहीदों की बारे में यही कहेंगे,,,,,,
हम फानी नहीं हैं फना क्या करेंगे
हमें मारकर वो भला क्या करेंगे?
हथेली पै जो सर लिए फिर रहे हों
वो सर उनका धड़ से जुड़ा क्या करेंगे?
और
क्या भगत सिंह वीर को यूं ही भुलाया जाएगा
बेश कीमत लाल क्या यूं ही खफाया जाएगा?
तोड़ दो असेंबली और घर फूंक दो सैय्याद का
तीन के बदले में यह जालिम मिटाया जाएगा।
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