महिला आरक्षण बिल 2023 पर मुस्तकीम मंसूरी का बयान: विपक्ष के दबाव से ही महिलाओं को मिला 33% हक



संविधान के अधिकारों को लागू करने में विपक्ष की भूमिका अहम, अब पसमांदा और पिछड़ी महिलाओं को भी मिले भागीदारी

रिपोर्ट-निशा अरोरा 

लखनऊ। भारतीय पसमांदा मुस्लिम महासभा के प्रदेश प्रभारी मुस्तकीम मंसूरी ने महिला आरक्षण बिल 2023 को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यह कानून केवल सत्ता पक्ष की देन नहीं, बल्कि विपक्ष के लगातार दबाव और संघर्ष का परिणाम है, जिसके चलते केंद्र सरकार को महिलाओं को 33% आरक्षण देना पड़ा।

विपक्ष के संघर्ष का परिणाम है यह कानून

मुस्तकीम मंसूरी ने कहा कि वर्षों से विपक्षी दल संसद के अंदर और बाहर महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की आवाज उठाते रहे। अगर विपक्ष लगातार दबाव नहीं बनाता, तो यह बिल इतने लंबे समय तक लंबित ही रहता। उन्होंने कहा
“लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष ही जनता के अधिकार दिलाता है, और महिला आरक्षण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

संविधान के अनुरूप है महिला आरक्षण

उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि
अनुच्छेद 14 सभी को समानता का अधिकार देता है
अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है
मुस्तकीम मंसूरी के अनुसार,
महिला आरक्षण बिल संविधान की भावना के अनुरूप है, लेकिन इसे लागू करने में देरी यह दिखाती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी।
पसमांदा और पिछड़ी महिलाओं के लिए अलग प्रावधान की मांग
करते हुए मुस्तकीम मंसूरी ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण के अंदर पसमांदा, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं को अलग से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
उन्होंने सरकार से मांग करते हुए कहा की
ओबीसी और पसमांदा मुस्लिम महिलाओं के लिए उप-कोटा तय किया जाए
ताकि वास्तविक सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सके
सत्ता पक्ष पर साधा निशाना साधते हुए
उन्होंने कहा कि सरकार ने यह कदम राजनीतिक मजबूरी में उठाया है, क्योंकि देश में महिलाओं और सामाजिक संगठनों का दबाव लगातार बढ़ रहा था।
अगर सरकार पहले ही यह कानून ले आती, तो महिलाओं को काफी पहले ही उनका अधिकार मिल जाता,
मुस्तकीम मंसूरी ने कहा कि महिला आरक्षण बिल 2023 एक ऐतिहासिक कदम जरूर है, लेकिन इसे पूरी तरह न्यायसंगत बनाने के लिए सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों की महिलाओं को विशेष भागीदारी देना जरूरी है।
उन्होने आखिर में साफ तौर पर कहा कि 
यह लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है, बल्कि असली लड़ाई अब शुरू हुई है समान और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की। जिसे पसमांदा समाज लड़ने की रणनीति पर संयुक्त पसमांदा मोर्चा शीघ्र लखनऊ में बैठक बुलाकर अगली रणनीति तय करेगा।

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