मिशन 2027: पसमांदा समाज बना सियासत का नया केंद्र, बढ़ी दलों की बेचैनी



लखनऊ से निशा अरोड़ा की रिपोर्ट
 लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो चुकी है, और इस बार सियासत का फोकस तेजी से पसमांदा समाज की ओर शिफ्ट होता नज़र आ रहा है। भारतीय पसमांदा मुस्लिम महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मकसूद अंसारी के नेतृत्व में चल रहे “मिशन 2027” ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है।
ईद के मौके पर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के निर्देश पर प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का मकसूद अंसारी के आवास पहुंचकर मुलाकात करना इस बात का साफ संकेत है कि पसमांदा समाज अब सत्ता की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की ओर बढ़ रहा है। इस मुलाकात में 2027 के चुनावी समीकरणों पर गंभीर चर्चा हुई।
सिर्फ बसपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत कई बड़े राजनीतिक चेहरों से मकसूद अंसारी की लगातार मुलाकातें इस बदलते समीकरण की ओर इशारा कर रही हैं।
5 अप्रैल 2026 को प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित ईद मिलन समारोह और पसमांदा संयुक्त मोर्चा की बैठक ने इस सियासी हलचल को और तेज कर दिया। यहां 15 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर पसमांदा मोर्चा को नजरअंदाज किया गया, तो 2027 के चुनावी समीकरण पूरी तरह बिगड़ सकते हैं।
इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव की मकसूद अंसारी से मुलाकात ने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। शिवपाल यादव ने साफ संकेत दिए हैं कि इस मुद्दे पर जल्द ही अखिलेश यादव के साथ रणनीतिक बैठक होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार पसमांदा समाज “किंगमेकर” की भूमिका में नजर आ सकता है। मकसूद अंसारी द्वारा गठित संयुक्त पसमांदा मोर्चा ने प्रदेश की 50 विधानसभा सीटों को चिन्हित कर वहां मजबूत पकड़ बनाने की रणनीति तैयार कर ली है।
इनमें से 15 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं, जबकि शेष 35 सीटों पर मजबूत प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया जारी है। खास बात यह है कि मोर्चा इन सीटों पर जातीय और आर्थिक जनगणना के आधार पर उम्मीदवार तय करने की योजना पर भी काम कर रहा है।
मकसूद अंसारी ने साफ कहा है कि जो भी राजनीतिक दल पसमांदा समाज द्वारा चिन्हित 50 सीटों पर उनके प्रत्याशियों को प्राथमिकता देगा, उसी दल के साथ चुनावी गठबंधन किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पसमांदा समाज अब हाशिए की ताकत नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों का केंद्र बनता जा रहा है। 2027 का चुनाव इस    नई सामाजिक- राजनीतिक ताकत की असली परीक्षा भी होगा और असर भी।

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