डॉ भीमराव अंबेडकर की विरासत और भारत के संविधान को बचाने की आज सबसे बड़ी जरूरत
मुनेश त्यागी
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने भारत के जिस जनकल्याणकारी संविधान को बनाया था आज उस पर पूंजीवादी और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ द्वारा सबसे बड़ा हमला किया जा रहा है। संविधान विरोधी इन ताकतों के गठजोड़ ने भारत के संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को जानबूझकर कर मटियामेट कर दिया है और डॉ भीमराव अंबेडकर ने आजादी, समता, समानता, भाईचारे और जनतंत्र का जो झंडा बुलंद किया था, आज भारत के जनतंत्र और संविधान विरोधी ये पूंजीवादी और सांप्रदायिक ताकतें उसी मनुवाद को लागू करने में लग गई हैं, जिसका डॉक्टर अंबेडकर ने दिलो जान से डटकर मुकाबला और खात्मा किया था। इन्होंने जनहितकारी आरक्षण का खात्मा कर दिया है और ये ताकतें जनता के शिक्षा और रोजगार के अधिकार पर सबसे बड़ा हमला कर रही हैं और उसे अशिक्षित और आर्थिक रूप से गरीब और पिछड़ा बनाए रखने की मुहिम में जुट गई हैं।
वैसे तो दुनिया में बहुत सारे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने समय-समय पर समाज को बदलने की मुक्तिकारी दिशा दी है। इनमें मुख्य रूप से गौतम बुद्ध, कबीर दास, अरस्तु, रूसो, प्लेटो, अब्राहम लिंकन, कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, रामास्वामी पेरियार, ज्योतिबा फुले, लेनिन, जॉर्दन ब्रूनो, कॉपरनिकस, न्यूटन, होब्स, लोक, रुसो, माओ त्से तुंग, हो ची मिन्ह, फिदेल कास्त्रो, चे गुवेरा, नेल्सन मंडेला, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी, भगत सिंह, बिस्मिल, मुजफ्फर अहमद, राजा महेंद्र प्रताप सिंह, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन आदि रहे हैं। मगर इन्हीं में एक प्रमुख नाम डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का भी है जिन्होंने हमारे देश के अछूतों, शूद्रों, वंचितों, पीड़ितों और अभावग्रस्त इंसानों को मुक्ति की राह दिखाईं और समाज में समता, समानता, न्याय और आपसी भाईचारा पैदा करने की बात की और औरतों को शिक्षा, समानता, आजादी और रोजगार की मुहिम चलाई और इसे पूरा किया।
अंबेडकर 14 अप्रैल 1891 को पैदा हुए थे, उनके पिता राम जी और माता भीमाबाई थी। भीमराव अंबेडकर को अपने जन्म से ही संघर्ष का सामना करना पड़ा था, उनको सामाजिक अन्याय और छूआछूत का सामना करना पडा। नाई ने उनके बाल नहीं काटे, गाड़ी वाले ने गाड़ी पर नहीं बिठाया, तांगे वाले ने तांगे पर नहीं बिठाया, पानी नहीं पीने दिया गया, मंदिरों में घुसने नहीं दिया गया, तालाबों से पानी नहीं पीने दिया गया, ऊंची जातियों ने कमरा नहीं दिया और सड़क पर चलने तक की मनाही उनको झेलनी पड़ी।
अंबेडकर अपने बचपन से ही पढ़ाकू प्रवृत्ति के विद्यार्थी थे, इसी मनोवृति के तहत उन्होंने शिक्षा की कई डिग्रियां हासिल कीं जैसे एम ए, एमएससी, डीएससी, बार एट ला, एल एल डी आदि डिग्रियां उन्होंने प्राप्त की। वे जातिवाद, छुआछूत और वर्ण व्यवस्था को सामाजिक कोढ समझते थे। यहीं पर यह जानना बहुत जरूरी है कि आखिर अंबेडकर ने क्या किया? उनके कार्यों की सूची बहुत लंबी है जैसे उन्होंने जनता को वाणी दी, नारे दिए, लड़ना और संघर्ष करना सिखाया, कालेज खोले, अखबार और पत्र निकाले, लेख लिखे, किताबें लिखीं, ज्ञान प्राप्ति की, जनता को जगाया, खतरे मोल लिए, तर्क करना सिखाया, शिक्षा का प्रचार किया, मनुवाद की कब्र खोदी और श्रमिक एकता की बात की और जनता का लिखने, पढ़ने, संगठित होने और संघर्ष करने का आह्वान किया, जिससे एक नया समाज बनाया जा सके, जिसमें समता हो, समानता हो, आपसी भाईचारा हो, न्याय हो, सबका विकास, आजादी और राजकीय समाजवाद हो।
वे एक ऐसे समाज का सपना देखते थे जिसमें भाईचारा हो, बंधुत्व हो, शोषण ना हो ,समता और समानता हो, अन्याय न हो, भेदभाव ना हो, और ऐसे ही समाज की स्थापना के लिए पूरी जिंदगी लगे रहे, संघर्ष करते रहे। उन्होंने पत्थर खाए, जलसों का नेतृत्व किया, सत्याग्रह किए, अछूत समुदाय के लोगों को तालाबों और मंदिरों में प्रवेश कराए, जाति की खाई को पाटने वाला पुल बने। इन्होंने अन्याय, अत्याचार का विरोध किया। वे अवैज्ञानिकता, अंधविश्वासों, पाखंडों और अज्ञानता के जानी दुश्मन थे। मनुस्मृति को मानव विरोधी किताब बताकर उसको सरेआम जला किया।
वे कहते थे कि बंधुत्व के बिना प्रजातंत्र, समता, समानता, न्याय, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता सब अधूरे हैं। उनका कहना था कि अस्पृश्यता और असमानता के विनाश के लिए, असली जनतंत्र और क्रांति की जरूरत है। वे विद्रोह का प्रतीक थे, विज्ञान के शिल्पी थे। उन्होंने अज्ञान, अत्याचार, दमन और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया और वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अन्याय के चिर विद्रोही थे। उन्होंने अपने जीवन में नारा दिया,,, अस्पर्शता जलाओ, जातिभेद जलाओ, मनुस्मृति जलाओ और उन्होंने यह किया भी। उन्होंने भारत की जनता को नारे दिए,,, शिक्षित हो, संगठित हो, संघर्ष करो, प्रचारक बनो और आशावादी बनो। उनके ये कमाल के नारे हैं, जिन्हें आज भी हमारी जनता अपने संघर्षों में खुलकर इस्तेमाल करती है।
अंबेडकर साहेब जन्मजात बागी थे। कांग्रेस से बगावत, गांधी से बगावत, शोषक और अन्यायी हिंदू समाज से बगावत, जातिवाद से बगावत, वर्णवाद से बगावत। वे उच्च कोटि के त्यागी, तपस्वी, संघर्षी, अविराम विद्रोही, तेजस्वी वक्ता, लेखक, महान विचारक, आंदोलनकर्ता, चिरविद्रोही, पुस्तक प्रेमी, संयमी, मितव्यई, पढ़ाकू और सत्रह अट्ठारह घंटे अध्यन करने वाले स्वाबलंबी व्यक्ति थे।
उनकी लिखी पुस्तकों की सूची भी लंबी है जैसे 1.शूद्र कौन?, 2.जाति विनाश, 3.हिंदुत्व की पहेलियां, 4.भारत में जातियां, 4.भारत में खेती-बाड़ी और उनका निदान, 5.रुपए की समस्या, 6. पाकिस्तान का विचार, 7. बौद्ध और मार्क्स। वे स्पष्ट वक्ता थे, अपनी बात के पक्के थे, अपनी धुन के पक्के थे, वे पूंजीवाद, जातिवाद, वर्णवाद और मनुवाद के जानी दुश्मन थे। वे इन चारों को मजदूरों और समाज का दुश्मन समझते थे। वे भारतीय संविधान के शिल्पी थे। जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, भाईचारा, सामाजिक न्याय, समता, समानता, बोलने, लिखने यूनियन बनाने और धर्म की आजादी, सबको सस्ता और सुलभ न्याय, आर्थिक विषमता का खात्मा, राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता, आरक्षण, ज्ञान विवेक और वैज्ञानिक संस्कृति और भारत की मिली जुली संस्कृति भारत के संविधान के बुनियादी सिद्धांत हैं।
उन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए प्रोफेसर, लेक्चरर, जज जैसे पद छोड़ें, समाज सेवा के लिए नौकरी नहीं की और वकालत की, ताकि अभावग्रस्त और वंचितों की कानूनी सहायता की जा सके और मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके। उनका मानना था कि हिंदू धर्म एक रोग है, एक विकृति है, यह अधिकांश जनों को धन संग्रह नहीं करने देता, अशिक्षित रखना चाहता है, निर्धन रखना चाहता है, अनपढ़ रखना चाहता है, मंदिर नहीं जाने देता, यह भाईचारे और समानता का विरोधी है। यह लोगों में छुआछूत फैलाता है और उनको अछूत ही बनाए रखना चाहता है और उनको सब प्रकार की आजादियों का विरोधी है।
हिंदुत्ववादी राष्ट्र के बारे में उनका कहना था कि "हिंदू धर्म मनुष्य की स्वतंत्रता, समता, भाईचारे का दुश्मन है, हिंदुत्ववादी राष्ट्र को किसी भी कीमत पर बनने से रोको।" यह था अम्बेडकर का असली सपना। वे समरसता, आजादी, समानता, भाईचारे, जातीय एकता और समस्त श्रमिकों की एकता के हामी थे। वे मनुवाद, जातिवाद, वर्णवाद, जातीय शोषण, अन्याय और भेदभाव के शत्रु और विरोधी थे। उनका कहना था कि "जब तक समाज में सभी को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आजादी नहीं मिलेगी, तब तक हमारा समाज आजाद नहीं हो सकता और उन्होंने जोर देकर कहा था कि जब तक हमारे देश के समस्त नागरिकों को आर्थिक आजादी नहीं मिल जाती, तब तक राजनीतिक आजादी के कोई मायने नहीं है।" उन्होंने यह भी जोर देकर कहा था कि "चाहे जितना अच्छा संविधान बना लो, अगर उसको लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो उस संविधान के होने के कोई मायने नहीं है और ऐसा संविधान जनता की इच्छा को कभी पूरा नहीं कर सकता।"
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने जो संविधान बनाया था, आज उस पर जातिवाद, संप्रदायिकता, फासीवाद, पूंजीवाद, क्षेत्रीयता और भाषावाद के भयंकर और खतरनाक हमले किये जा रहे हैं। आज हमें किसी भी कीमत पर अंबेडकर साहब के इन विचारों को बचाना होगा और संविधान, जनतंत्र, आपसी भाईचारे और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर हमले करने वालों का मिलजुलकर और संगठित होकर मुकाबला करना होगा और उनको सत्ता और सरकार से बेदखल करना होगा। हमें आज यह सोचना है कि आखिर डॉ अंबेडकर के सपने कैसे पूरे होंगे? आज पूरा का पूरा लुटेरा शासक वर्ग और मनुवादी ताकतों के लोग अंबेडकर के बनाए संविधान पर हमले कर रहे हैं, वे संविधान के सिद्धांतों पर, प्रस्थापना, प्रतिज्ञा और आदर्शों का घोर विरोध उल्लंघन कर रहे हैं। वे अंबेडकर के सपनों, विचारधारा, मान्यताओं और सिद्धांतों को मटियामेट कर रहे हैं और एक तरह से अंबेडकर के विचारों की हत्या करने पर आमादा हो गये हैं और उन्होंने बिना घोषित किये ही मनुवाद के जन विरोधी सिद्धांतों को फिर से लागू कर दिया है।
डॉक्टर अंबेडकर ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, वैज्ञानिक संस्कृति और किसानों मजदूरों की बेहतरी की जो बात संविधान में की थी, इन मुद्दों को लेकर 1917 में हुई रूसी क्रांति के बाद रूस में धरती पर उतारा जा चुका था। वहां पर क्रांति के बाद सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य, सब को रोजगार, सबको घर, सबको जमीन और धन में सब का हिस्सा आदि मूलभूत बातें संविधान में लिखी गई थीं और इन पर अमल करते हुए अगले 25 सालों में रूस दुनिया का सबसे विकसित और एक महाशक्ति बन बैठा। इन्हीं सब मुद्दों को अंबेडकर ने भारत के संविधान में शामिल किया था ताकि भारत की सारी जनता का कल्याण हो सके उसे मुक्त शिक्षा, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार हासिल हो सकें। डॉ अंबेडकर ने मार्क्स की किताबों का विशेष अध्ययन किया था और उन्होंने जोर देकर कहा था की सभी शोषित पीड़ित मेहनतकशों को मार्क्स और एंगेल्स की लिखी किताब "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" का विषेश रूप से मन लगाकर अध्ययन करना चाहिए।
अंबेडकर अम्बेडकर कम्युनिस्ट फिलासफी यानी साम्यवादी दर्शन और सोच से भी काफी प्रभावित थे।कम्युनिस्ट फिलासफी यानी कम्युनिस्ट दर्शन के बारे में डॉ आंबेडकर की दो नई जानकारियां सामने आई हैं। पहली जानकारी के अनुसार डॉक्टर अंबेडकर के बारे में लोकलहर में लिखे गए एक लेख में गोविंद पानसरे ने मराठी में अपनी पुस्तक "धर्म, जाति, वर्ग और रूपांतरण की दिशाएं" में ध्यान खींचा है। इसका संबंध 1952 से है। हरिभाऊ पगारे ने कर्मवीर दादा साहेब गायकवाड (जो अंबेडकर के सबसे घनिष्ठ सहयोगियों में से थे) की अपनी जीवनी में दर्ज किया है कि 1952 के चुनाव के बाद निराशा के मूड में अंबेडकर ने गायकवाड को लिखा था,,," मेरा मन करता है कि अनुसूचित ( जाति) फेडरेशन को छोड़ दूं। इतना ही नहीं, मेरा मन कर रहा है कि राजनीति से पूरी तरह रिटायर (अलग) हो जाऊं। मुझे लगता है कि यह इतना आसान भी नहीं है फिर भी मुझे नहीं लगता कि मेरा राजनीतिक दर्शन फौरन जनता के कल्याण तक ले जाने वाला है। मेरे सिवाय और कोई भी हमारे लोगों की पीड़ा नहीं जानता। अपने कल्याण तक पहुंचाने के लिए उन्हें भी कब तक इंतजार करना होगा? मैं इस राय पर पहुंच रहा हूं कि "मुझे
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कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो जाना चाहिए।""
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दूसरी जानकारी के अनुसार बीबीसी के एक पत्रकार द्वारा 1953 में डॉक्टर अंबेडकर का टीवी इंटरव्यू लिया गया था जिसमें डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा था कि"भारत में लोकतंत्र कामयाब नहीं होगा। यह व्यवस्था असमानता पर आधारित है। सिर्फ भाषणों से बात नहीं बनेगी।" उन्होंने कहा था कि "जनता की मुक्ति का कार्यक्रम हो, एक राज मशीनरी
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हो, एक वैकल्पिक अवस्था हो। कम्युनिस्ट व्यवस्था *******†********************************
यह विकल्प हो सकती है। इस शोषणकारी व्यवस्था
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यकीन है और मुझे कम्युनिस्टों में। मैं चाहता हूं कि
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कम्युनिस्ट कुछ करें।"
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यहीं पर हम कहना चाहते हैं कि काश! अंबेडकर भी संविधान में शिक्षा और रोजगार को बुनियादी अधिकार बना देते, तो आज भारत की, भारत के संविधान की और उनके विचारों की यह दुर्गति न होती, जो आज हो रही है। फिर भी अंबेडकर सामाजिक क्रांति के क्रांतिधर्मां थे। उन्होंने कई क्रांतिकारी विचारों को संविधान में जोड़कर एक महान भूमिका अदा की थी। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि डॉ भीमराव अंबेडकर के सपनों को लागू करने के लिए, क्रांति की नई पटकथा लिखें और क्रांति की इस अधूरी कहानी को, हम सब एकजुट होकर, उनके क्रांतिकारी विचारों को धरती पर उतारें और देश में किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार स्थापित करें। केवल ऐसी सरकार ही संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को लागू करके, भारत की शोषित पीड़ित जनता का कल्याण कर सकती है।
इसमें हमारा एक ही कहना है कि तमाम मेहनतकश मजदूरों, किसानों को, नौजवानों को,महिलाओं को एकजुट किया जाए और उनको क्रांतिकारी संग्राम में लगाया जाय, किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार कायम कायम की जाय, दुनिया के सारे प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी समाजवादी देशों के इतिहास का अध्ययन करके और उन सब से एकजुट नतीजा निकालकर, जनता की एकता कायम की जाय। आज एलपीजी ने यानी,,,, लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन की आर्थिक नीतियों ने आरक्षण को नाकाम कर दिया है और संविधान में जो सपने डाक्टर अंबेडकर ने संजोए थे, उनके लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। आज डॉ अंबेडकर के मिशन के रास्ते में अनेक समस्याएं और चुनौतियां खड़ी हुई हैं। यह व्यवस्था लगभग फेल हो चुकी है। हमारी जनता आज भी अन्याय की सबसे बड़ी शिकार है, हमारे देश में आज साढ़े पांच करोड़ से ज्यादा मुकदमे विभिन्न अदालतों में पेंडिंग हैं जिस वजह से जनता को सस्ता और सुलभ न्याय नहीं मिल रहा है। यह स्थिति डॉक्टर अंबेडकर के विचारों और सपनों के बिल्कुल विपरीत है।
आज हमें विभिन्न चुनौतियों का अध्ययन और समाधान करना होगा। इन चुनौतियों का सामना किये के बिना और समस्याओं का समाधान किए बिना, हम डॉक्टर अंबेडकर के सपनों का भारत नहीं बना सकते, उनके सपनों को पूरा नहीं कर सकते। हमें जातिवाद से लड़ना है, दिन रात बढ़ती जा रही आर्थिक असमानता से लड़ना है और इसे रोकना है, सांप्रदायिकता से लड़ना है, सड़े हुए पूंजीवाद से लड़ना है, ऊंच-नीच की और बड़े छोटे की मानसिकता से लड़ना है और जनता की टूट से लड़ना है, उसके बिखराव से लड़ना है और हमें आपसी मनमुटाव और आपसी बिखराव से भी लड़ना होगा और जनता का मूलभूत कल्याण करने के लिए क्रांतिकारी वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था और किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार की स्थापना करनी होगी। इसके बिना डॉ आंबेडकर के सपनों का भारत नहीं बनाया जा सकता।
वर्तमान में डाक्टर अम्बेडकर की नीतियों और योजनाओं के विपरीत खडी इन जनविरोधी नीतियों और परिस्थितियों में हमें किसी भी दशा में, शिक्षित संगठित और संघर्षरत होना पड़ेगा और अपने सब गैरजरूरी मतभेद भुलाकर, एकजुट होना पड़ेगा, हमें इन सब मुद्दों पर जनता को एकजुट करना होगा और मिलजुलकर लड़ाई लड़नी होगी, तभी अंबेडकर के सपनों का भारत बनाया जा सकता है। वह भारत जिसमें क्रांतिकारी वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था वाली किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार हो, सबको शिक्षा और रोजगार हो, समता हो, समानता हो, आपसी भाईचारा हो, सामाजिक न्याय हो, सबका विकास हो, सबको आगे बढ़ने की आजादी हो और देश के सारे प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल पूरी देश की जनता के विकास और कल्याण के लिए हो। ऐसा करके ही गुपचुप रूप से लागू की जा रही वर्तमान सरकार की मनुवादी नीतियों को लागू करने की मुहिम को समाप्त किया जा सकता है और डॉ अंबेडकर के सपनों के भारत का निर्माण किया जा सकता हैं और उनकी नीतियों को लागू किया जा सकता है।
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