पसमांदा मुसलमानों को सत्ता से दूर रखना लोकतंत्र के साथ अन्याय-मुस्तकीम मंसूरी
ब्यूरो रिपोर्ट
संख्या में अधिक, लेकिन प्रतिनिधित्व में सबसे पीछे पसमांदा समाज? क्योंकि
राजनीतिक दलों ने केवल वोट बैंक समझा, हक़ नहीं दिया”
लखनऊ/उत्तर प्रदेश
अखिल भारतीय मंसूरी समाज के प्रदेश अध्यक्ष मुस्तकीम मंसूरी ने पसमांदा मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में पसमांदा समाज को जानबूझकर सत्ता की भागीदारी से दूर रखा गया है।
उन्होंने कहा कि पसमांदा मुसलमान आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बेहद पीछे हैं, जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
मुस्तकीम मंसूरी ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों ने हमेशा पसमांदा समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन टिकट वितरण और सत्ता में हिस्सेदारी के समय इस वर्ग की अनदेखी कर दी जाती है।
उन्होंने कहा,
पसमांदा समाज हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन जब प्रतिनिधित्व की बात आती है तो हमें नजरअंदाज कर दिया जाता है। आखिर क्यों?
प्रदेश अध्यक्ष ने मुस्लिम समाज के अंदर मौजूद असमानता पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अशराफ वर्ग का लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक संस्थानों पर वर्चस्व रहा है, जिसके कारण पसमांदा नेतृत्व को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला।
मुस्लिम समाज को एक जैसा दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि अंदर ही अंदर गहरी असमानता मौजूद है, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान पसमांदा समाज को उठाना पड़ रहा है,
मुस्तकीम मंसूरी ने यह भी माना कि पसमांदा समाज में शिक्षा और संसाधनों की कमी के कारण भी राजनीतिक नेतृत्व मजबूत नहीं हो पाया। उन्होंने सरकार और समाज दोनों से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि अब पसमांदा समाज अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहा है और आने वाले समय में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए मजबूती से आवाज उठाएगा।
अब समय आ गया है कि पसमांदा समाज खुद अपने हक़ की लड़ाई लड़े और राजनीतिक दलों से बराबरी का हिस्सा मांगे,
मुस्तकीम मंसूरी का यह बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति में पसमांदा मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। यह साफ संकेत है कि आने वाले समय में पसमांदा समाज अपनी राजनीतिक पहचान और हिस्सेदारी के लिए और अधिक मुखर हो सकता है।
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