महिला आरक्षण पर सरकार नीयत साफ करे, पसमांदा और पिछड़ी महिलाओं को भी मिले न्याय: मुस्तकीम मंसूरी



कानून पास, लेकिन लागू होने में देरी; विधि विशेषज्ञों के सवाल, लागू होने की समयसीमा पर असमंजस

रिपोर्ट-फिरदौस वारसी

बरेली। भारतीय पसमांदा मुस्लिम महासभा के प्रदेश प्रभारी मुस्तकीम मंसूरी 
ने कहा कि महिला आरक्षण कानून 2023 देश की महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक पहल जरूर है, लेकिन इसकी संवैधानिक प्रक्रिया और लागू करने की शर्तें सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने कहा कि संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों ने इस बिल को पास कराया, जो स्वागत योग्य है, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर लागू करने में देरी करना महिलाओं के अधिकारों के साथ न्याय नहीं है।
 क्योंकि विधि विशेषज्ञों की राय संवैधानिक 
 विशेषज्ञों के अनुसार
यह कानून तभी लागू 
होगा। जब जनगणना 
पूरी हो और उसके बाद परिसीमन किया जाए,
इसलिए इसे तुरंत लागू करना संभव नहीं है।
जैसे केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामला के अनुसार, किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
 इसलिए लागू होने की समयसीमा यदि 
जनगणना: 1–2 वर्ष
परिसीमन: 1–2 वर्ष कुल संभावित समय 3 से 5 वर्ष हो सकता है।
 इसलिए संभावित लागू होने का समय: 2027–2029 जो प्रक्रियाओं पर निर्भर है। 
मुस्तकीम मंसूरी ने कहा कि कुल 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं परंतु 
SC/ST महिलाओं को उनके मौजूदा कोटे के भीतर हिस्सा, लेकिन 
OBC महिलाओं के लिए अलग उप-कोटा 
नहीं, वही अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं,
जबकि डॉ. अंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि
 राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बिना सामाजिक न्याय अधूरा है।
उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण कानून इस दिशा में एक बड़ा कदम जरूर है, लेकिन
 सकारात्मक पहलू
यह है महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी 
बढ़ेगी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या ऐतिहासिक रूप से बढ़ सकती है। वहीं दूसरी ओर जो चुनौतियां हैं,
उसमें OBC और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग प्रतिनिधित्व का अभाव,
लागू होने में देरी,
सामाजिक रूप से मजबूत वर्गों की महिलाओं को अधिक लाभ मिलने की आशंका
 ऐसे में कहा जा सकता 
है कि यह कानून अंबेडकर के सपने की दिशा में एक कदम है, लेकिन पूरी तरह उस सपने को साकार नहीं करता।
मुस्तकीम मंसूरी ने कहा कि भारतीय पसमांदा मुस्लिम महासभा का मानना है कि जब तक OBC, पसमांदा और अल्पसंख्यक महिलाओं को स्पष्ट और न्यायपूर्ण हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक यह आरक्षण सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर खरा नहीं उतरेगा। उन्होंने कहा 
कि विपक्ष ने समर्थन के साथ-साथ तुरंत लागू करने और सामाजिक संतुलन की मांग उठाई
परंतु अब सरकार की जिम्मेदारी है कि
 प्रक्रिया को तेज करे
 और सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित 
करें।महिला आरक्षण कानून ऐतिहासिक जरूर है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब यह समय पर लागू हो और समाज के हर वर्ग की महिलाओं को समान भागीदारी दे
तभी यह कानून डॉ. अंबेडकर के सामाजिक और राजनीतिक न्याय के सपने को सही मायनों में पूरा कर पाएगा।

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