बरेली की राजनीति का नया समीकरण: क्या 2027 में शहर और कैंट सीट पर बदलेगा जातीय गणित?



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

1989 से शहर सीट पर कायस्थ नेतृत्व का दबदबा, कैंट में वैश्य चेहरों की लगातार जीत; लेकिन एसआईआर के बाद बढ़े मुस्लिम युवा मतदाता बदल सकते हैं 2027 का चुनावी समीकरण

बरेली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बरेली की 124 शहर विधानसभा और 125 कैंट विधानसभा हमेशा से सामाजिक और जातीय समीकरणों का बड़ा केंद्र रही हैं। इन दोनों सीटों पर भाजपा लंबे समय से मजबूत स्थिति में रही है और इसका सबसे बड़ा आधार कायस्थ एवं वैश्य समाज को माना जाता रहा है।
हालांकि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बदले हुए मतदाता समीकरणों ने राजनीतिक दलों की रणनीति को नया मोड़ दे दिया है। एसआईआर के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा मतदाता जुड़े हैं, जिसके चलते अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस बार विपक्ष मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव लगाएगा या फिर भाजपा को चुनौती देने के लिए एक बार फिर वैश्य समाज का चेहरा सामने लाया जाएगा।
बरेली शहर विधानसभा सीट पर 1989 के बाद से लगातार कायस्थ समाज के नेताओं का दबदबा देखने को मिला है। भाजपा ने इस सीट पर शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारी वर्ग और कायस्थ मतदाताओं के सहारे लगातार अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शहर सीट पर भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक-
कायस्थ समाज, वैश्य समाज, व्यापारी वर्ग, 
शहरी हिंदू मतदाता
रहा है।
यही कारण रहा कि अन्य दलों द्वारा वैश्य समाज के उम्मीदवार उतारे जाने के बावजूद वैश्य वोट पूरी तरह विपक्ष के साथ नहीं गया और उसका बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ बना रहा।
125 कैंट विधानसभा की राजनीति भी लगभग इसी दिशा में आगे बढ़ती रही है। 2012 के बाद से यहां भाजपा ने वैश्य समाज से जुड़े चेहरों के माध्यम से लगातार चुनावी सफलता हासिल की।
कैंट सीट पर व्यापारी वर्ग और वैश्य समाज का प्रभाव लंबे समय से निर्णायक माना जाता रहा है। भाजपा का संगठनात्मक ढांचा और पारंपरिक समर्थन इस सीट पर उसकी सबसे बड़ी ताकत बना रहा।
2022 विधानसभा चुनाव में विपक्ष ने भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की थी।
124 शहर विधानसभा सीट से वरिष्ठ नेता राजेश अग्रवाल समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी थे, जबकि 125 कैंट विधानसभा सीट से सुप्रिया ऐरन सपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरी थीं। दोनों ही नेता वैश्य समाज से आते हैं और माना जा रहा था कि उन्हें वैश्य मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिल सकता है।
लेकिन चुनाव परिणामों ने अलग तस्वीर पेश की। दोनों सीटों पर मुकाबला अपेक्षाकृत नजदीकी रहा, फिर भी वैश्य समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ बना रहा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वैश्य मतदाताओं का पूर्ण समर्थन न मिल पाने के कारण विपक्ष इन सीटों पर जीत दर्ज नहीं कर सका।
इसे राजनीतिक गलियारों में इस रूप में देखा गया कि वैश्य समाज ने एक बार फिर भाजपा के प्रति अपनी पारंपरिक निष्ठा और भरोसे को मजबूत तरीके से प्रदर्शित किया। यही कारण है कि भाजपा आज भी शहर और कैंट सीट पर वैश्य समाज को अपना सबसे विश्वसनीय वोट बैंक मानती है।
2027 चुनाव से पहले सबसे बड़ा बदलाव मतदाता सूची पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद देखने को मिल रहा है।
सूत्रों के अनुसार शहर और कैंट दोनों सीटों पर बड़ी संख्या में नए युवा मतदाता जुड़े हैं, जिनमें मुस्लिम युवाओं की संख्या उल्लेखनीय बताई जा रही है।
विशेषकर कैंट विधानसभा क्षेत्र, जिसे लंबे समय से मुस्लिम बहुल इलाकों वाली सीट माना जाता रहा है, वहां नए मतदाता भविष्य की राजनीति में बड़ा असर डाल सकते हैं। वहीं शहर विधानसभा में भी मुस्लिम युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या राजनीतिक दलों का ध्यान खींच रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपक्ष को लगता है कि मुस्लिम, पिछड़ा और दलित वोटों का मजबूत गठजोड़ तैयार हो सकता है, तो 2027 में पहली बार शहर और कैंट सीट पर मुस्लिम प्रत्याशी गंभीर दावेदार के रूप में सामने आ सकते हैं।
हालांकि दूसरी ओर यह भी संभावना बनी हुई है कि विपक्ष भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए फिर किसी मजबूत वैश्य चेहरे पर दांव खेले।
क्योंकि पिछले चुनावों का अनुभव यह बताता है कि शहर और कैंट विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का सबसे मजबूत सामाजिक आधार आज भी कायस्थ और वैश्य समाज ही माना जाता है।
बरेली की शहर और कैंट विधानसभा सीटें अब केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रह गई हैं।
एक ओर भाजपा का पारंपरिक और संगठित वोट बैंक है, तो दूसरी ओर नए युवा मतदाता और बदलता सामाजिक गणित।
अब सबसे बड़ा सवाल  
यही है कि क्या विपक्ष मुस्लिम प्रत्याशी के जरिए नया प्रयोग करेगा?
या फिर भाजपा को चुनौती देने के लिए वैश्य समाज के चेहरे पर ही भरोसा जताएगा?
2027 का चुनाव इन दोनों सीटों पर केवल प्रत्याशियों का नहीं बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों और पारंपरिक राजनीतिक विश्वास की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

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