कायदे मिल्लत डॉ. अब्दुल जलील फरीदी: “85 बनाम 15” के सामाजिक इंकलाब के नायक थे



  रिपोर्ट: मुस्तकीम मंसूरी

 डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की यौमे-वफ़ात पर देशभर में उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया जा रहा है। 

भारतीय मुस्लिम सियासत और सामाजिक न्याय की राजनीति में डॉ. फरीदी का नाम एक ऐसे दूरदर्शी नेता के रूप में लिया जाता है जिन्होंने आज़ादी के बाद दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को एक साझा राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया।
डॉ. फरीदी सिर्फ मुस्लिम नेतृत्व की आवाज़ नहीं थे, बल्कि वह सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और बहुजन राजनीति के मजबूत पैरोकार थे। उन्होंने उस दौर में एक ऐसी सोच दी जिसने बाद की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
सन 1968 में जब देश की राजनीति पर पारंपरिक दलों का दबदबा था, तब डॉ. अब्दुल जलील फरीदी ने “85 बनाम 15” का ऐतिहासिक फार्मूला दिया। उनका मानना था कि देश की लगभग 85 प्रतिशत आबादी — जिसमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय शामिल हैं — ही इस देश की असली ताकत और सत्ता के वास्तविक वारिस हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से यह वर्ग बिखरा हुआ है।
डॉ. फरीदी ने इस बहुसंख्यक समाज को जागरूक करने, उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब तक दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक एक साझा सामाजिक और राजनीतिक मंच पर नहीं आएंगे, तब तक उन्हें बराबरी और सम्मान का अधिकार नहीं मिल सकेगा।
डॉ. फरीदी ने महसूस किया कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने मुसलमानों, दलितों और पिछड़े वर्गों को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन उन्हें नेतृत्व और नीतिगत भागीदारी में उचित स्थान नहीं दिया गया।
इसी सोच के साथ उन्होंने मुस्लिम मजलिस की स्थापना की। मुस्लिम मजलिस का उद्देश्य केवल मुस्लिम राजनीति नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय आधारित नई राजनीतिक चेतना पैदा करना था।
उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों को यह समझाया कि लोकतंत्र में सम्मान वही समाज पाता है जो राजनीतिक रूप से संगठित और जागरूक हो।
डॉ. फरीदी के इंतकाल के बाद उनके “85 बनाम 15” के मिशन को आगे बढ़ाने का कार्य कांशीराम ने किया। कांशीराम ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने के लिए “सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय” का नारा दिया और बहुजन समाज पार्टी का गठन किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की कई बार सत्ता तक पहुंच के पीछे यही सामाजिक समीकरण और बहुजन एकता का सिद्धांत सबसे बड़ी ताकत बना। यह वही विचारधारा थी जिसकी बुनियाद डॉ. अब्दुल जलील फरीदी ने दशकों पहले रखी थी।
कांशीराम के निधन के बाद बहुजन राजनीति का वह व्यापक सामाजिक आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया। दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज की साझा राजनीतिक एकजुटता भी पहले जैसी मजबूत नहीं रह सकी।
इसके बावजूद डॉ. फरीदी की विचारधारा आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति में प्रासंगिक मानी जाती है। उनके समर्थकों का कहना है कि आज देश के संविधान, लोकतंत्र और सेकुलर मूल्यों को मजबूत करने के लिए दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को फिर से एकजुट होने की आवश्यकता है।
डॉ. फरीदी हमेशा संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के समर्थक रहे। उनका मानना था कि भारत की ताकत उसकी विविधता और सामाजिक एकता में है। आज उनकी यौमे-वफ़ात पर उनके चाहने वालों ने यह संदेश दोहराया कि सांप्रदायिक ताकतों और सामाजिक विभाजन की राजनीति के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
भारतीय राजनीति में डॉ. अब्दुल जलील फरीदी का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है जिसने सत्ता को केवल शासन नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी और सम्मान का माध्यम माना। “85 बनाम 15” का उनका फार्मूला आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति में एक महत्वपूर्ण विचारधारा के रूप में चर्चा में रहता है।
यौमे-वफ़ात पर देशभर में लोग उन्हें याद करते हुए यही कह रहे हैं कि “कायदे मिल्लत” ने जो राजनीतिक चेतना जगाई थी, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संघर्ष और अधिकारों की प्रेरणा बनी रहेगी।

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