खुला ख़त बना बहस का मरकज़ (केंद्र) “मरता हुआ ज़मीर (अंतरात्मा) और बिकती हुई रहनुमाई (नेतृत्व)” पर उठे सख्त सवाल
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
रहनुमाओं (नेताओं) पर कौम (समुदाय) के मसाइल (समस्याओं) नजरअंदाज़ (अनदेखा) करने का इल्ज़ाम (आरोप), सियासी (राजनीतिक) समझौतों और खामोशी पर गहरा अफसोस
समाज के अंदर क़ियादत (नेतृत्व) और उसके किरदार (भूमिका) को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है। हाल ही में एक खुला ख़त सोशल मीडिया और लोकल सतह (स्थानीय स्तर) पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ रहनुमाओं (नेताओं) और उलेमा-ए-किराम (धार्मिक विद्वान) पर संगीन (गंभीर) सवाल खड़े किए गए हैं। इस ख़त में इल्ज़ाम (आरोप) लगाया गया है कि जिन लोगों पर क़ौम (समुदाय) की रहनुमाई (मार्गदर्शन) और रहबरी (नेतृत्व) की जिम्मेदारी थी, वही आज सियासी (राजनीतिक) दबाव और अपने फायदे के आगे झुकते नज़र आ रहे हैं।
ख़त की शुरुआत बेहद जज़्बाती (भावनात्मक) और तल्ख (कड़वे) अंदाज़ में की गई है, जिसमें कहा गया है कि “मरता हुआ ज़मीर (अंतरात्मा) और बिकती हुई रहनुमाई (नेतृत्व)” आज का सच बन चुका है। लिखने वाले ने साफ़ कहा है कि ये शिकवा (शिकायत) किसी गैर (दूसरे) से नहीं, बल्कि अपने ही लोगों से है, जो कभी सच्चाई और दीयानतदारी (ईमानदारी) की मिसाल हुआ करते थे।
विरासत से इनहिराफ (दूर होना/भटकना) का इल्ज़ाम
खत में कहा गया है कि जिन ख़ानदानों और शख्सियतों (व्यक्तियों) की पहचान कभी “तक़वा (परहेज़गारी)” और “इल्म (ज्ञान)” से होती थी, आज वो सिर्फ सरकारी दरबारों में हाजिरी तक महदूद (सीमित) होकर रह गए हैं।
मुसन्निफ (लेखक) के मुताबिक बुजुर्गों ने फ़क़ीरी (सादगी) और खुद्दारी (आत्मसम्मान) को अपनाया था, लेकिन आज उनकी नस्लें (पीढ़ियां) सियासी (राजनीतिक) फायदे और प्रोटोकॉल के पीछे दौड़ रही हैं।
रहनुमाई के नाम पर सियासत
ख़त में ये भी कहा गया है कि जब क़ौम (समुदाय) मुश्किल हालात में होती है, तो वो अपने रहनुमाओं (नेताओं) की तरफ उम्मीद से देखती है, लेकिन अब वही रहनुमा सियासी (राजनीतिक) सौदेबाजी में मसरूफ (व्यस्त) हो चुके हैं।
रहनुमाई (मार्गदर्शन) के नाम पर क़ौम को “गुलामी (दासता)” और “जी-हुजूरी (चापलूसी)” की राह दिखाई जा रही है। जो लोग कभी हक़ (सच्चाई) की बात बेख़ौफ़ होकर करते थे, आज वही छोटे-छोटे फायदे और कुर्सियों के लिए ख़ामोशी अख़्तियार (अपनाए) किए हुए हैं।
तालीम (शिक्षा), रोज़गार और पहचान का मसला
ख़त में कौम के बुनियादी मसाइल (समस्याओं) जैसे तालीम (शिक्षा) और रोज़गार को भी उठाया गया है। कहा गया है कि जब नौजवान तालीम (शिक्षा) और नौकरी के लिए दर-ब-दर (इधर-उधर) भटक रहे हैं, तब रहनुमा सिर्फ रस्मी (औपचारिक) प्रोग्राम और दिखावे में लगे हुए हैं।
इसके अलावा क़ौम (समुदाय) की पहचान और वजूद (अस्तित्व) पर उठ रहे सवालों के बीच क़ियादत (नेतृत्व) की ख़ामोशी को भी फिक्र (चिंता) की बात बताया गया है।
आख़िरी सवाल ने झकझोर दिया
ख़त के आखिर में एक बेहद अहम (महत्वपूर्ण) सवाल उठाया गया है कि क्या अब भी रहनुमाओं (नेताओं) के अंदर इतना ज़मीर (अंतरात्मा) बाकी है कि वो समझ सकें कि वो क़ौम के रहबर (मार्गदर्शक) नहीं, बल्कि सियासत (राजनीति) के मोहरे बन चुके हैं?
मुसन्निफ (लेखक) ने आगाह (चेतावनी) किया है कि अगर यही हालत रही, तो आने वाली नस्लें (पीढ़ियां) उन्हें एक “आलिम (विद्वान)” के तौर पर नहीं, बल्कि एक “दरबारी (चापलूस)” के तौर पर याद रखेंगी।
समाज में बहस तेज
इस खुले खत के सामने आने के बाद मुख्तलिफ (विभिन्न) हलकों (वर्गों) में बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कड़वा मगर सच्चा आईना बता रहे हैं, तो कुछ इसे मुबालगा (बढ़ा-चढ़ाकर कहना) भी कह रहे हैं।
लेकिन इतना तय है कि इस ख़त ने क़ियादत (नेतृत्व) की जिम्मेदारी और जवाबदेही (जवाबदेही) पर एक संजीदा (गंभीर) बहस शुरू कर दी है।
ये खुला ख़त सिर्फ़ इल्ज़ामात (आरोपों) का पुलिंदा नहीं, बल्कि एक आईना है, जिसमें समाज अपनी क़ियादत (नेतृत्व) का असली चेहरा देख रहा है। अब देखना ये है कि रहनुमा इस पर क्या रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) देते हैं और क्या इससे कोई मुसबत (सकारात्मक) तब्दीली (बदलाव) आती है या नहीं।
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