कांग्रेस से निकले दलों का उत्थान-पतन, क्या फिर राष्ट्रीय धुरी बनने की ओर कांग्रेस?


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

क्षेत्रीय दलों का उभार, फिर सीमित होता जनाधार; बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नई रणनीति की जरूरत


लखनऊ: देश की राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लंबे समय तक केंद्र में रही, लेकिन समय के साथ उसी कांग्रेस से अलग होकर कई बड़े नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियाँ बनाई। इन दलों ने अपने-अपने राज्यों में मजबूत पकड़ बनाई, सत्ता हासिल की, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अधिकांश दल सीमित दायरे में सिमट गए और कई आज हाशिए पर नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस से अलग होकर बने दलों का सफर
कांग्रेस से अलग होकर 1990 के दशक के बाद कई महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दल अस्तित्व में आए।
शरद पवार ने 1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई, जिसने महाराष्ट्र में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी विभाजन और जनाधार में गिरावट देखने को मिली।
इसी तरह ममता बनर्जी ने 1998 में तृणमूल कांग्रेस बनाई और पश्चिम बंगाल में लगातार सत्ता में बनी रहीं, लेकिन पार्टी का प्रभाव राज्य तक ही सीमित रहा।
आंध्र प्रदेश में वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने 2019 में भारी बहुमत 175 में 151 सीटें हासिल की, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार नहीं कर सकी।
ओडिशा में नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल दो दशकों से अधिक समय से सत्ता में रहा, परंतु राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका सीमित ही रही।
1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिली थीं, लेकिन 1989 के बाद क्षेत्रीय दलों का उभार तेजी से हुआ।
2004 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व में UPA सरकार रही, लेकिन 2014 के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदल गया और राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरण बने।
विश्लेषण बताते हैं कि कई क्षेत्रीय दल अपने राज्यों में 40 से 60 प्रतिशत तक वोट शेयर हासिल करते रहे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव 10 प्रतिशत के भीतर ही सीमित रहा।
जनता का बदलता रुख
शुरुआत में क्षेत्रीय दलों को स्थानीय मुद्दों और पहचान की राजनीति के कारण व्यापक समर्थन मिला, लेकिन समय के साथ कई दलों पर परिवारवाद, सीमित नेतृत्व और राष्ट्रीय मुद्दों पर स्पष्ट नीति के अभाव के आरोप लगे।
इसके चलते कई दलों का जनाधार सिमटा और मतदाताओं ने नए विकल्पों की तलाश शुरू की।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्षी दलों का बिखराव साफ दिखाई देता है। ऐसे में कांग्रेस के पास आज भी देशव्यापी संगठन, ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी जैसे मजबूत आधार मौजूद हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस अपनी संगठनात्मक ताकत को मजबूत करती है और क्षेत्रीय दलों के साथ संतुलित तालमेल बनाती है, तो वह एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार देश को मजबूत और स्थिर सरकार देने के लिए क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
2004 में बनी UPA सरकार इसका उदाहरण रही, जहां विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने मिलकर केंद्र में स्थिर सरकार बनाई थी।
देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है, लेकिन मौजूदा हालात में एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प के लिए समन्वय और साझा रणनीति की जरूरत महसूस की जा रही है।
यदि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल साथ आते हैं, तो यह गठजोड़ देश को नई दिशा दे सकता है।

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