यौमे-वफ़ात पर ख़िराज-ए-अक़ीदत डॉ. अब्दुल जलील फरीदी: एक अज़ीम शख्सियत





19 मई उर्दू अदब, मिल्लत-ए-इस्लामिया और इंसानियत से मोहब्बत करने वालों के लिए एक अफसोसनाक दिन है। यही वह दिन है जब एक ऐसी महान शख्सियत हमसे जुदा हुई, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानी ख़िदमत, मज़लूमों की हिमायत और उर्दू ज़बान के तहफ़्फुज़ के लिए वक्फ़ कर दी। वह शख्सियत थीं कायदे मिल्लत डॉ. अब्दुल जलील फरीदी।
डॉ. फरीदी केवल एक माहिर डॉक्टर नहीं थे, बल्कि एक बेहतरीन इंसान, बेबाक रहनुमा और दूरदर्शी नेता भी थे। गरीबों और बेसहारा लोगों की मदद करना उनकी फितरत में शामिल था। उनके क्लीनिक पर आने वाला हर मरीज इंसानियत और हमदर्दी का एहसास लेकर लौटता था।
उन्होंने तिब्ब (चिकित्सा) के मैदान में अपनी गैर मामूली सेवाओं के कारण लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। रोजाना सैकड़ों मरीजों का इलाज करते थे। वह मरीजों को सिर्फ दवाइयां ही नहीं, बल्कि हौसला और उम्मीद भी देते थे।
जब मुसलमानों पर हालात मुश्किल हुए और उनके हकों को नजरअंदाज किया जाने लगा, तब डॉ. अब्दुल जलील फरीदी ने आवाज बुलंद की। उन्होंने उर्दू ज़बान के लिए जोरदार आंदोलन चलाया और रोजाना गिरफ्तारियां दीं। उनका कहना था कि उर्दू केवल एक ज़बान नहीं, बल्कि तहज़ीब और संस्कृति की पहचान है।
उन्होंने उर्दू को चारमीनार वाले के कानून से बचाने के लिए भी संघर्ष किया। वह अपने सिद्धांतों पर मजबूती से कायम रहे। वर्ष 1968 में उन्होंने “85 बनाम 15” का मशहूर नारा दिया, जो समाज में बराबरी और इंसाफ़ की आवाज बना।
डॉ. फरीदी ने अपनी जिंदगी कौमी एकता, इंसाफ़ और इंसानी ख़िदमत के लिए समर्पित कर दी। 19 मई 1974 को वह इस दुनिया से रुख्सत हो गए, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और सेवाएं आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
आज उनकी यौमे-वफ़ात पर तमाम लोग उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश कर रहे हैं और उनकी मिल्लत, इंसानियत तथा उर्दू के लिए दी गई सेवाओं को याद कर रहे हैं।

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