महानतम क्रांतिकारी लेनिन से इतने खौफजदा क्यों?

मुनेश त्यागी 
  कल पता चला कि बंगाल चुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल करने के बाद, लेनिन की मूर्ति को भी गिरा/ढहा दिया। इससे पहले भी  त्रिपुरा में बीजेपी और आरएसएस ने चुनाव जीतकर लेनिन की मूर्ति को ढहा दिया था। जब इतिहास पढ़ते हैं तो पता चलता है कि लेनिन भारत की आजादी के सबसे बड़े समर्थक थे। उन्होंने बंगाल विभाजन का विरोध किया था, जलियांवाला कांड की निंदा की थी, तिलक को जेल भेजने के खिलाफ आवाज उठाई थी। लेनिन गांधी को जन आंदोलन के प्रेरक और नेता मानते थे।
     भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अनेक बड़े नेता जैसे पंडित नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, शहीदे आज़म भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, रविंद्र नाथ टैगोर, तिलक, निराला और प्रेमचंद लेनिन के विचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। प्रेमचंद ने तो अपने उपन्यास में यहां तक कह दिया था कि पूरे "इंकलाब की बात करो।" भगत सिंह द्वारा जेल में लिखे गए लेखों में भगत सिंह ने लिखा था कि मार्क्स लेनिन के विचारों से ही भारत के जनता और मजदूर किसानों का कल्याण हो सकता है। लेनिन के विचारों से प्रभावित होकर ही हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने उसमें सबसे पहले "समाजवादी" शब्द जोड़ा था और इसे हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन बना दिया था यानी समाजवाद को दल का अंतिम लक्ष्य घोषित किया था। 
    लेनिन के विचारों से प्रभावित होकर भगत सिंह और साथियों ने 24 जनवरी 1930 को लाहौर षड्यंत्र केस में अदालत में आने पर मजिस्ट्रेट के सामने "समाजवादी क्रांति जिंदाबाद" और "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद", "मजदूर राज की जीत हो" और सरमायेदारी का नाश हो" के नारे लगाए थे।
      भगत सिंह और उनके साथी लेनिन के क्रांतिकारी विचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। 2 फरवरी 1931 को "क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा" अपने लेख में, भगत सिंह ने पूरे गांवों और फैक्ट्रियों में जन जागृति फैलाने की बात की थी और कहा था कि नौजवानों को एक पार्टी बनानी चाहिए जो मजदूर किसानों में क्रांति का प्रचार करेंगी। इसी महत्वपूर्ण लेख में लेख में भगत सिंह ने कहा था कि किसानों और मजदूरों का जनता का सक्रिय समर्थन हासिल करने के लिए प्रचार भी जरूरी है और इसके लिए एक पार्टी की जरूरत है। पार्टी का नाम "कम्युनिस्ट पार्टी हो।"
       यहीं पर सवाल उठता है कि आखिर सांप्रदायिक ताकतें बीजेपी और आरएसएस को महान क्रांतिकारी लेनिन से इतना डर क्यों है? वे सब लेनिन इतने खौफजदा क्यों हैं ? वे बार-बार लेनिन की मूर्तियों को क्यों ढ़हा रहे हैं। हकीकत यह है कि लेनिन की मूर्ति तोड़ने वाले, लेनिन की क्रांतिकारी नीतियों, सिद्धांतों, रीति रिवाजों और विचारों और व्यक्तित्व से इसलिए खौफजदा हैं क्योंकि लेनिन दुनिया के तमाम गरीबों, वंचितों, शोषितों और पीड़ितों के सबसे बड़े और आदरणीय हीरो हैं। वे दुनिया के अधिकांश किसानों, मजदूरों और तमाम मेहनतकशों के नेता हैं। वे क्रांति के सबसे बड़े नेता है और किसानों मजदूरों की एकता के सबसे बड़े समर्थक हैं।
     लेनिन ही बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में 1917 की रूसी क्रांति में, मजदूरों और किसानों की राज्य, सत्ता और सरकार को धरती पर उतारकर लाए थे। लेनिन ने रूसी क्रांति के बाद मेहनतकशों और तमाम जनता की मुक्ति के असली कार्यक्रम बनाए थे। रुसी क्रांति के बाद ही  रुस में सबको मुफ्त आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा, सबको अनिवार्य इलाज, सबको रोटी, कपड़ा, मकान, सबको रोजगार, सबको मनोरंजन के अवसर प्रदान किए थे। लेनिन के नेतृत्व में ही लोगों में गीत, संगीत, कला के प्रति रूझान पैदा किया था और सत्ता और सरकार का इस्तेमाल जनता के बुनियादी मुद्दों को सुलझाने के लिए किया था, सामंतों और पूंजीपतियों का मुनाफा, अन्याय और दौलत बढ़ाने के लिए नहीं।
    लेनिन के नेतृत्व में ही मजदूर और किसानों को 8 घंटा काम, 8 घंटा मनोरंजन और 8 घंटा आराम का सिद्धांत कायम किया गया था। उनके नेतृत्व में ही जमीन का सामूहिककारण करके, जोतने वालों को जमीन का मालिक बनाकर, सोवियत संघ को विकास के मार्ग पर और ज्यादा मजबूती से आगे ले गए थे। लेनिन के नेतृत्व में ही महिलाओं के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा और काम का बुनियादी अधिकार कायम किया गया था और उन्हें पुरुषों के बराबर वेतन देने की व्यवस्था की गई थी। लेनिन ही दुनिया के तमाम शोषितों, गरीबों, वंचितों और अभावग्रस्तों के असली मुक्तिदाता बने थे।
    लेनिन ही काल्पनिक समाजवाद को "वैज्ञानिक समाजवादी" व्यवस्था में बदलकर, धरती पर उतारने वाले सबसे पहले नेता और संस्थापक बने थे। लेनिन ने ही रूसी क्रांति के बाद, दुनिया में पहली दफा सामंतों और पूंजीपतियों की सरकार के स्थान पर, "किसानों मजदूरों की सरकार और सत्ता" कायम की थी।उन्होंने दुनिया भर के शांति और मुक्ति आंदोलनों को दिशा और गति प्रदान की थी। लेनिन के जनकल्याणकारी आदर्शों और सिद्धांतों के कारण देखते ही देखते, एक तिहाई से ज्यादा दुनिया क्रांतिकारी मार्ग पर चली चल पड़ी थी। महान लेनिन और उनकी सरकार ने धर्म को राजनीति से अलग किया और धर्मनिरपेक्षता की नींव रखी थी। क्रांतिकारी आलोचना और आत्मआलोचना को जन्म दिया था। लेनिन ने ही सारी दुनिया के लोगों को आपसी प्यार, मोहब्बत, शांति, सहयोग और भाईचारे के सूत्र में पिरोया था और रूस में जातिवाद के सवालों का समाधान पेश किया था।
     लेनिन ने ही नेताओं और जनता की "कथनी और करनी का भेद" मिटाया था। उन्होंने ने ही क्रांतिकारी बदलाव के लिए "पेशैवर क्रांतिकारी" विचार की स्थापना की थी और खुद को मिटाकर, जनता का हमदर्द बनाया था जो जनता को सुख चैन के लिए जिएं और मरें। लेनिन ने ही कहा था कि "अयोग्य और नाकाबिल लोगों" को पार्टी का नेतृत्व नहीं देना चाहिए, उन्हें पार्टी के नेतृत्व से दूर रखना चाहिए और लेनिन ने ही "सतत क्रांति" और "सतत क्रांतिकारी" बने रहने का सिद्धांत पेश किया था और जोर देकर कहा था कि "सतत क्रांति और सतत क्रांतिकारी बने रहने के बिना, क्रांतिकारी आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता और क्रांति जन्म नहीं ले सकती।"
      ऐसे लेनिन की मूर्ति को, ये देशी विदेशी पूंजीपतियों के दलाल, सांप्रदायिक, जातिवादी, आतंकवादी, अलगाववादी और जनता की एकता को तोड़ने वाले, भला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? लेनिन ने दुनिया में सबसे पहले सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का समूल विनाश करके मजदूरों और किसानों की राज सत्ता और सरकार कायम की थी और इस मजदूर विरोधी सोच और मानसिकता का खात्मा किया था उनकी कब्र खो दी थी। लेनिन की इस महान विरासत को आज पूरी दुनिया देख रही है कि किसानों और मजदूरों की सरकार और वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था के बिना शोषित, पीड़ित और अन्याय के शिकार किसानों, मजदूरों और तमाम मेहनतकशों का कल्याण नहीं हो सकता।
     लेनिन ने ही वर्गविहीन, वर्णविहीन, शोषणविहीन, अन्यायविहीन, शांतिपूर्ण व्यवस्था और भेदभावरहित और आपसी सहयोग और भाईचारे की समाज व्यवस्था कायम करने की वकालत की थी और इसी समाज-व्यवस्था को दुनिया में सबसे पहले रुस की धरती पर उतारा था और पूरी दुनिया को ऐसी ही क्रांतिकारी व्यवस्था स्थापित करने की राह दिखाई थी। यही सब कारण हैं कि आज की हिंदुत्ववादी, ताकतें लेनिन की मूर्ति को बार-बार ढ़हा रही हैं। वे लेनिन के क्रांतिकारी विचारों से बुरी तरह से डरी हुई हैं और पूरी तरह से भयभीत हैं।
      लेनिन की मूर्ति तोड़ने वाले कह रहे हैं कि "लेनिन विदेशी थे उनकी मूर्ति का यहां भारत में क्या मतलब है?" वैसे कोई भी विचार और महान व्यक्तित्व विदेशी नहीं होते। अगर ऐसा होता तो फिर हिटलरशाही भी विदेशी है, उसे भी भारत की धरती से निकाल फेंकिए। संसद, कानून का शासन विदेशी हैं, टीवी, कमीज, पजामा, रोटी,  राइफल, बंदूक, तोप, बम, रिवाल्वर, ड्रोन, मिसाइल, एटमबोम्ब, बिजली, रेडियो, गैस का चूल्हा, किताब, कागज, पैंट, शर्ट, रेल, बस, मोटरबाइक, कार, फोन, मोबाइल, बिजली आदि सभी विदेशी हैं। इन सबको देश निकाला दे देना चाहिए। सांप्रदायिक ताकतों की यह सारी बहस और तर्क एकदम बचकानी, मौकापरस्त और गुमराह करने वाली है। इसे कतई भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। 
     आज हमारे अधिकांश मजदूर, किसान, महिलाएं, छात्र, नौजवान, लेखक, पत्रकार और साहित्यकार और बुध्दिजीवी, लेनिन के क्रांतिकारी और वैज्ञानिक समाजवादी विचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उन्हें पता है कि लेनिन ने समस्त मेहनतकशों के कल्याण के लिए क्या-क्या क्रांतिकारी कदम उठाए थे। इन समस्त साम्प्रदायिक सौहार्द और जनता की एकता को तोड़ने वाली साम्प्रदायिक ताकतों का जनता के कल्याण में कोई विश्वास नहीं है। ये आज भी सामंतवाद, पूंजीवाद, जातिवाद और साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी एजेंट और हमदर्द बनी हुई हैं, इसलिए ये लेनिन के विचारों से सबसे ज्यादा डरे हुए और भयभीत हैं और उनकी मूर्ति को बार-बार तोड़ रहे हैं।
     यहीं पर याद रखने की जरूरत है कि ये लेनिन की मूर्ति तोड़ने वाले जनता की समता, ममता, समानता, न्याय, प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे के दुश्मन है। इन्हें लेनिन के क्रांतिकारी समाजवादी और जनकल्याणकारी विचारों में कोई विश्वास नहीं है। ये लेनिन के विचारों से सबसे ज्यादा डरते हैं। लेनिन इन्हीं मानव मूल्यों के सबसे बड़े हामी और समर्थक थे। इन्हीं सब कारणों से ये मूर्ति तोड़ने वाले और उनके आका, लेनिन से बहुत ज्यादा डरे हुए हैं। ये सब लेनिन से पूरी तरह से खौफजदा हैं।
   और हकीकत यह भी है कि ये सारी सांप्रदायिक ताकतें अपनी जनविरोधी, अवसरवादी, मौकापरस्त, गुमराह करने वाली और सांप्रदायिक सोच और मानसिकता के कारण, महान क्रांतिकारी परिवर्तन के नायक लेनिन से हमेशा भयभीत रहेंगी। आज सोशल मीडिया और फेसबुक पर लेनिन की मूर्ति तोड़ने का सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है और लेनिन के जनकल्याणकारी विचारों का सबसे ज्यादा समर्थन किया जा रहा है लेनिन फिर से सजीव होकर गांव, शहर, गली, मौहल्ले, सड़कों, खेत खलियान और घर-घर में जिंदा हो गए हैं और बेहद खुशी की बात है कि वहां पर महान कोमरेड लेनिन के क्रांतिकारी विचारों पर संजीदा चर्चा हो रही है। ऐसे वक्त में हम तो यही कहेंगे,,,,
लेनिन जिंदाबाद, 
इंकलाब जिंदाबाद 
वैज्ञानिक समाजवाद जिंदाबाद, 
किसानों मजदूरों की सरकार जिंदाबाद।

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