ईद उल अज़हा पर कुर्बानी का असली मकसद क्या है?



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

मुफ़्ती सलाउद्दीन अय्यूबी ने शरीयत की रोशनी में बताया-किन लोगों पर कुर्बानी वाजिब, किस माल से हो कुर्बानी और कैसे तक़सीम हो गोश्त

बरेली। मुफ़्ती सलाउद्दीन अय्यूबी ने ईद उल अज़हा के मौके पर मस्जिद आला हज़रत, मोहल्ला कानून गोयान बरेली से जारी अपने विशेष संदेश में कहा कि कुर्बानी केवल जानवर ज़बह करने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा, तक़वा, इताअत और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को ज़िंदा करने का पैग़ाम है।
उन्होंने कहा कि ईद उल अज़हा मुसलमानों को यह सबक देती है कि इंसान अल्लाह के हुक्म के सामने अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी कुर्बान करने का जज़्बा रखे। कुरआन शरीफ़ में अल्लाह तआला फरमाता है कि “अल्लाह तक न उनका गोश्त पहुंचता है और न खून, बल्कि तुम्हारा तक़वा पहुंचता है।”
मुफ़्ती सलाउद्दीन अय्यूबी ने कहा कि शरीयत के मुताबिक हर उस मुसलमान मर्द और औरत पर कुर्बानी वाजिब है जो साहिब-ए-निसाब हो, यानी जिसके पास अपनी जरूरतों से ज्यादा इतना माल हो कि वह ज़कात के निसाब के बराबर पहुंचता हो। ऐसे लोगों को ईद उल अज़हा के दिनों में कुर्बानी करना जरूरी है। जबकि गरीब, मुसाफिर या वह व्यक्ति जिसके पास निसाब के बराबर माल न हो, उस पर कुर्बानी वाजिब नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुर्बानी के लिए इस्तेमाल होने वाला माल पूरी तरह हलाल और पाक होना चाहिए। हराम कमाई, सूद, धोखाधड़ी, रिश्वत या किसी का हक़ मारकर खरीदे गए जानवर की कुर्बानी शरीयत की नज़र में मक़बूल नहीं होती। कुर्बानी अल्लाह की इबादत है और इबादत के लिए पाक कमाई का होना बेहद जरूरी है।
मुफ़्ती साहब ने कहा कि कुर्बानी के गोश्त को शरीयत ने बेहद खूबसूरत तरीके से तक़सीम करने की तालीम दी है। बेहतर तरीका यह है कि गोश्त के तीन हिस्से किए जाएं -एक हिस्सा अपने घर वालों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए तथा तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों में तक़सीम किया जाए ताकि ईद की खुशियां हर घर तक पहुंच सकें।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त को घर में रखने की भी इजाज़त है। अगर जरूरत हो तो इंसान कई दिनों तक गोश्त अपने इस्तेमाल के लिए रख सकता है। पहले के दौर में कुछ ख़ास हालात की वजह से रोक लगाई गई थी, लेकिन बाद में इसकी इजाज़त दे दी गई। इसलिए शरीयत के मुताबिक कुर्बानी का गोश्त लंबे समय तक रखा जा सकता है, बशर्ते उसे सही तरीके से सुरक्षित रखा जाए।
आखिर में मुफ़्ती सलाउद्दीन अय्यूबी ने लोगों से अपील की कि ईद उल अज़हा के मौके पर दिखावा, फिजूलखर्ची और सोशल मीडिया की नुमाइश से बचें तथा कुर्बानी के असली मक़सद यानी तक़वा, इंसानियत, गरीबों की मदद और अल्लाह की इताअत को अपनाएं। उन्होंने कहा कि ईद की खुशियों में गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों को जरूर शामिल करें, यही इस्लाम की असली तालीम है।

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