ममता बनर्जी की सियासी रणनीति का उल्टा वार: भाजपा को बंगाल में जगह देने से ‘इंडिया गठबंधन’ तक, अब घिरती दिख रही टीएमसी
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
कांग्रेस से अलग होकर भाजपा के साथ बढ़ीं ममता, वामपंथ को खत्म करने की राजनीति अब खुद टीएमसी पर भारी? विपक्षी एकता में दरार और बदलते समीकरणों पर उठ रहे सवाल
लखनऊ: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। विपक्षी दलों के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि जिस राजनीतिक रणनीति के तहत ममता बनर्जी ने करीब तीन दशक पहले वामपंथ को कमजोर करने के लिए भाजपा को बंगाल की राजनीति में जगह दी थी, वही रणनीति अब उनकी अपनी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (तृणमूल कांग्रेस) के लिए चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस से अलग होकर क्षेत्रीय ताकत बनने वाली तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ समय-समय पर जो राजनीतिक समीकरण बनाए, उसने बंगाल में भाजपा की जड़ें मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब जब भाजपा राज्य में मुख्य विपक्षी शक्ति बन चुकी है, तब ममता बनर्जी की पुरानी राजनीतिक रणनीतियां ही उनके खिलाफ सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही हैं।
साल 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर वरिष्ठ नेता मुकुल राय के साथ मिलकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। उस दौर में बंगाल की राजनीति पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया मार्क्सवादी और वाममोर्चे का दबदबा था। ममता बनर्जी ने वामपंथ को सत्ता से हटाने के लिए भाजपा के साथ राजनीतिक समीकरण बनाए।
1999 में वह भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में शामिल हुईं और रेल मंत्री बनीं। बाद में ऑपरेशन वेस्ट एंड विवाद के बाद उन्होंने एनडीए से दूरी बना ली, लेकिन 2003 में फिर भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गईं।
अगस्त 2001 में दिए गए एक इंटरव्यू में ममता बनर्जी ने भाजपा को अपनी पार्टी का “स्वाभाविक सहयोगी” बताया था। यह बयान उस समय काफी चर्चित रहा था। 2003 में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यक्रमों में भी शामिल हुईं और कई भाजपा व संघ नेताओं ने उन्हें “बंगाल की दुर्गा” तक बताया।
भाजपा के तत्कालीन राज्यसभा सांसद बालवीर कुंज ने संसद में ममता बनर्जी की प्रशंसा करते हुए उन्हें “साक्षात दुर्गा” कहा था। वहीं संघ से जुड़े नेताओं ने वामपंथ के खिलाफ उनकी लड़ाई को खुला समर्थन दिया था।
राजनीतिक गलियारों में उस समय सबसे ज्यादा चर्चा तब हुई जब ममता बनर्जी ने अपने भाषणों में मोहन भागवत समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई नेताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें “सच्चा देशभक्त” बताया। बाद के वर्षों में संघ के मुखपत्रों में भी उनकी सादगी और राजनीतिक जीवनशैली की खुलकर प्रशंसा की गई।
2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ ममता बनर्जी सबसे मुखर विपक्षी नेताओं में शामिल रहीं। उन्होंने बंगाल में बड़े आंदोलन किए और भाजपा पर तीखे हमले बोले। लेकिन संसद में सीएए पर मतदान के दौरान तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों की अनुपस्थिति को लेकर विपक्षी खेमे में सवाल उठे। आलोचकों ने आरोप लगाया कि इससे विधेयक पारित होने का रास्ता आसान हुआ।
इसके अलावा मुर्शिदाबाद में सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और तृणमूल नेताओं के विवादित बयानों को लेकर भी पार्टी विपक्ष के निशाने पर रही।
2017 में भाजपा में शामिल हुए मुकुल रॉय 2021 विधानसभा चुनाव से पहले फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट आए। उनकी वापसी को लेकर भी विपक्ष ने ममता बनर्जी की राजनीतिक लाइन पर सवाल उठाए। चुनाव प्रचार के दौरान मुकुल रॉय का यह बयान भी काफी चर्चा में रहा कि “भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस एक जैसी हैं।”
उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की साझा उम्मीदवार मारग्रेट अल्वा का समर्थन न करना और तृणमूल सांसदों का मतदान से दूरी बनाना भी विपक्षी दलों को नागवार गुजरा। उस चुनाव में जगदीप धनकर की जीत के बाद विपक्ष के भीतर तृणमूल कांग्रेस की भूमिका पर बहस तेज हो गई।
इसके बाद कई मौकों पर ममता बनर्जी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़े संगठनों के प्रति नरम बयान देने से विपक्षी एकता पर और सवाल उठे।
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा भी तेज है कि देश की कई क्षेत्रीय पार्टियां-जैसे बीजू जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, भारत राष्ट्रीय समिति,और अन्य दल-समय के साथ भाजपा की बढ़ती राजनीतिक ताकत के सामने कमजोर होते गए। अब तृणमूल कांग्रेस को लेकर भी इसी तरह की चर्चाएं सामने आने लगी हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि विपक्षी राजनीति में लगातार अलग राह अपनाने और “इंडिया गठबंधन” से दूरी बढ़ाने का असर भविष्य में तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में भाजपा की बढ़ती ताकत और विपक्षी एकता में दरार अब ममता बनर्जी के सामने नई चुनौती बनकर खड़ी दिखाई दे रही है।
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