कर्ज का बहाना बनाकर कुर्बानी से बचना सही नहीं”- डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी


रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

मायरा हॉस्पिटल एंड क्रिटिकल केयर सेंटर के डायरेक्टर ने ईद-उल-अज़हा से पहले दिया खास पैगाम, कहा - कुर्बानी सिर्फ रस्म नहीं बल्कि अल्लाह की इताअत और इंसानियत का सबक है 

बरेली। ईद-उल-अज़हा के मुबारक मौके पर मायरा हॉस्पिटल एंड क्रिटिकल केयर सेंटर के डायरेक्टर डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी ने मुस्लिम समाज को अहम संदेश देते हुए कहा कि कुर्बानी इस्लाम की अज़ीम इबादतों में से एक है और जो लोग साहिबे-निसाब होने के बावजूद सिर्फ कर्जदार होने का बहाना बनाकर कुर्बानी से बचते हैं, उन्हें शरीयत की सही समझ हासिल करनी चाहिए।डॉ. अंसारी ने कहा कि इस्लाम में कुर्बानी हर उस मुसलमान, बालिग, समझदार और साहिबे-निसाब व्यक्ति पर वाजिब है जिसके पास अपनी जरूरतों से ज्यादा माल मौजूद हो। यदि किसी व्यक्ति पर कर्ज है लेकिन कर्ज अदा करने के बाद भी उसके पास निसाब के बराबर माल बचता है, तो उस पर कुर्बानी वाजिब रहेगी।
उन्होंने कहा कि आज समाज में कुछ लोग आलीशान जिंदगी, महंगी गाड़ियां और बेहतर आमदनी होने के बावजूद केवल “कर्जदार” होने का हवाला देकर कुर्बानी से बचने की कोशिश करते हैं, जबकि शरीयत में असल पैमाना यह है कि व्यक्ति कर्ज घटाने के बाद भी साहिबे-निसाब है या नहीं।

“कुर्बानी तक़वा और इंसानियत का पैगाम है”

डॉ. मोहम्मद ख़ालिक़ अंसारी ने कहा कि कुर्बानी केवल जानवर जिबह करने का नाम नहीं, बल्कि यह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत और अल्लाह की राह में हर कुर्बानी देने के जज़्बे का प्रतीक है। कुर्बानी इंसान को त्याग, मोहब्बत, बराबरी और गरीबों की मदद का संदेश देती है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि ईद-उल-अज़हा के मौके पर दिखावे और प्रतिस्पर्धा से बचें तथा सादगी, खालिस नीयत और शरीयत के मुताबिक कुर्बानी अदा करें। साथ ही अपने आसपास मौजूद जरूरतमंद और गरीब परिवारों का भी ख़ास ख्याल रखें ताकि ईद की खुशियां हर घर तक पहुंच सकें।

“हलाल कमाई और सही नीयत सबसे अहम”

डॉ. अंसारी ने कहा कि कुर्बानी का असली मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना है, इसलिए कुर्बानी हलाल कमाई और पाक नीयत के साथ की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में धार्मिक समझ और इंसानियत दोनों को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि ईद-उल-अज़हा का असली पैग़ाम लोगों तक पहुंच सके।

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