दुनिया के सबसे बड़े क्रांतिकारी लेखक और दार्शनिक कार्ल मार्क्स

मुनेश त्यागी

हड़पते हैं जो मेहनत को 
उनको हड़पने की बात करो,
बेनूर सुबह के हामीं हैं वो 
तुम लाल सुबह की बात करो।
       जर्मनी में जन्मे कार्ल मार्क्स शोषण जुल्म अन्याय से मानव मुक्ति के सबसे बड़े दार्शनिक, विश्व सर्वहारा के महान नेता और शिक्षक थे। कार्ल मार्क्स एक न्यायपूर्ण समाज की सबसे मजबूत आधार शिला हैं। वे वैज्ञानिक समाजवाद के सबसे बड़े प्रणेता थे। वे एक महान शिक्षक, पथ-प्रदर्शक, बहुत बड़े दार्शनिक, प्रख्यात अर्थ शास्त्री, राजनीतिज्ञ, पत्रकार तथा मार्क्सवादी विचारधारा के सिद्धांतकार थे। वेबहुत बड़े लेखक और पत्रकार थे। उन्होंने अपनी क्रांतिकारी विचारों की वजह से बहुत सारे देश निकाले सहे।
      मार्क्स और ऐंगल्स दुनिया में मुनाफा केंद्रित व्यवस्था की जगह मानव केंद्रित समाजवादी व्यवस्था कायम करना चाहते थे। वे इस गुमराह समाज को मानवतावादी बनाने के लिए अपने जमाने के सबसे बड़े चिंतक और दार्शनिक थे। 20वीं सदी के अंत में बीबीसी न्यूज़ के एक ऑनलाइन सर्वे ने कार्ल मार्क्स को सहस्त्राब्दी का सबसे महान चिंतक ठहराया था। उस सर्वे में आइंस्टीन और चार्ल्स डार्विन दूसरे और चौथे स्थान पर थे।
     दुनिया के महानतम क्रांतिकारी कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी के त्रायर नगर में हुआ था। उनकी 208वीं वर्षगांठ पूरी दुनिया में मनायी जा रही है। कार्ल मार्क्स दुनिया के महानतम क्रांतिकारियों में से एक हैं। मार्क्स के विचारों के बाद दुनिया की चिंतन पद्धति ही बदल गई थी। इसके बाद दुनिया में एक वैचारिक क्रांति की और वैज्ञानिक समाजवादी क्रांति की सबसे बड़ी लड़ाई की शुरुआत हो गई थी जो दुनिया के अनेक देशों में आज भी जारी है। मार्क्स के विचार निम्न प्रकार थे,,,,,,
   1.मार्क्स ने बताया की वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति के बाद, मनुष्य का अभी तक का इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है, यानी यहां दो वर्ग हैं,,,, एक लुटेरा वर्ग है और दूसरा लूटे जाने वाला वर्ग। एक मालिक वर्ग है, और दूसरा मजदूर वर्ग है। पहला वर्ग दूसरे को लूटता और उसका शोषण करता आया है और यह लूट समाजवादी समाज के आने तक जारी रहेगी।
    2.मार्क्स ने आगे कहा कि सर्वहारा की सत्ता यानी कि मजदूर-वर्ग की सत्ता और सरकार ही किसानों और मजदूरों के अभी तक के शोषण, अन्याय, भेदभाव और गैरबराबरी को दूर कर सकती है। सत्ता और सरकार पर कब्जा किए बिना, मजदूर वर्ग और किसान वर्ग का और आम जनता का कल्याण नहीं हो सकता।
    3.उन्होंने आगे कहा कि साम्यवादी व्यवस्था कायम करके ही मानवता का कल्याण हो सकता है जिसमें न वर्ग रहेंगे और ना राज्य रहेगा यानि जो वर्ग-विहीन और राज्य-विहीन व्यवस्था होगी यानी इसमें सब का राज होग, ना कोई शासित होगा, ना कोई शासक होगा, ना कोई शोषण करने वाला होगा, ना किसी का शोषण होगा। सब लोग शिक्षित और समझदार हो जाएंगे। सब लोग काम करेंगे। किसी को काम करने के अधिकार से छूट नहीं मिलेगी। जो काम करेगा वही रोटी खाएगा। उन्होंने बताया कि अभी तक का समाज आदिम साम्यवाद, गुलाम समाज, सामंती समाज और पूंजीवाद समाज रहा है। इसके बाद समाजवादी व्यवस्था आयेगी और जब पूरी दुनिया में समाजवादी व्यवस्था कायम हो जायेगी तो उसके बाद साम्यवाद की व्यवस्था वाला समाज होगा।
     ४. उन्होंने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो, यानी कि जब तक दुनिया के पैमाने पर मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों की सत्ता कायम न हो जाएगी, तब तक काम चलने वाला नहीं है, इसलिए मनुष्य को अंतरराष्ट्रीयतावादी होना चाहिए। उसकी सोच पूरी दुनिया के लोगों के कल्याण की होनी चाहिए।
     ५. मार्क्स ने आगे बताया कि धर्म एक अफीम है। यह एक नशा है जिसमें दबे कुचले लोगों को अपना दुख दर्द भुलाने में मदद मिलती है, धर्म उन्हें दबाने और उनका शोषण करने में, लुटेरे शासक वर्ग की मदद करता है। मार्क्स ने कहा था कि "धर्म दबे कुचले लोगों के लिए राहत है, हृदयविहीन दुनिया के लोगों का हृदय है और आत्महीनों की आत्मा है, यह जनता की अफीम है।" मार्क्स  की यह  बात आज भी उतनी ही सही है, जितनी कि यह कहे जाने के समय थी।
       मार्क्स के विचार यानी मार्क्सवाद मानव मुक्ति का सूत्र है, मनुष्य के कल्याण का विज्ञान है। शोषण और अन्याय को खत्म करने का सबसे बड़ा विमर्श है। "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" जिसे मार्क्स और ऐंगेल्स दोनों ने मिलकर लिखा था, दुनिया के कम्युनिस्टों की सबसे अहम किताब है। मार्क्सवाद, वैज्ञानिक समाजवाद की बात करता है। मार्क्स और एंगेल्स के विचारों से पहले काल्पनिक समाजवाद की बात होती थी। मार्क्स और एंगेल्स ने ही वैज्ञानिक समाजवाद की रूपरेखा तैयार की थी जिसे महान कामरेड लेनिन के नेतृत्व में सबसे पहले 1917 की रूसी क्रांति में धरती पर उतारा गया था। मार्क्स के द्वारा लिखी गई किताब "पूंजी" दुनिया भर में प्रसिद्ध है जो पूंजीवादी शोषण की पोल खोलती है और क्रांति द्वारा समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन की बात करती है। मार्क्स और एंगेल्स ने 1864 में अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ की स्थापना में अपनी महती भूमिका अदा की और इसमें योगदान दिया और मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
    कार्ल मार्क्स एक महान क्रांतिकारी लेखक थे उनकी किताबों का विवरण इस प्रकार है,,, 1. जर्मन विचारधारा 1845,  2.पवित्र परिवार 1845, 3. आर्थिक और दार्शनिक लेख 1844, 4. थिसिस ओं फायरबाख 1845, 5. कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो 1848, 6. राजनीतिक अर्थशास्त्र 1858, 7. पूंजी, 8 फ्रांस में वर्ग संघर्ष, 9.फ्रांस में गृह युद्ध. इसके अलावा उन्होंने कई अखबारों में हजारों लेख लिखे थे।
     उनका जीवन भयानक आर्थिक कष्टों और संकटों में बीता था। 6 संतानों में तीन बच्चियां ही जीवित रहीं। उनके तीन बच्चे तो दवाई  के अभाव में ही दम तोड़ गए थे क्योंकि मार्क्स के पास उनके इलाज का पूरा पैसा जुटाना संभव नहीं था क्योंकि मार्क्स अधिकांश समय लिखने पढ़ने में लगे रहते थे जिस कारण उन्हें परिवार के लिए पैसा कमाने का समय नहीं मिलता था।
       मार्क्सवाद की देन,,,,,,, उपरोक्त पांच सूत्र दुनिया को बेहतर बनाने की मशाल के रूप में काम कर रहे हैं। मार्क्स के विचारों के बाद ही काम के आठ घंटे निर्धारित किए गए, औरतों को पुरुषों के बराबर वेतन मिलना शुरू हुआ, साप्ताहिक अवकाश मिलना शुरू हुआ, रिटायरमेंट होने पर पेंशन का आगाज हुआ, बाल श्रम पर प्रतिबंध लगा, शिक्षा बच्चों का पहला हक बनी, कई सारे बुनियादी अधिकारों की बात हुई जो लोगों को उपलब्ध भी कराए गए।
       यह बात अलग है कि आज पूंजीपतियों ने इकट्ठा होकर अपनी उस लूट को, उस हड़पने की नीति को और तेज कर दिया है और वैज्ञानिक समाजवाद के बाद मिले तमाम हक अधिकारों को मजदूरों, किसानों और जनता से लगभग छीन लिये हैं और वर्तमान पूंजीपतियों के शासन ने हमारे देश को आज से 79 साल पहले वाली अधिकार विहीन स्थिति में पहुंचा दिया है। मजदूरों ने लड़कर, संघर्ष करके, बलिदान करके, फांसियों पर चढ़कर और जेलों में जाकर जो कुछ हासिल किया था, पूंजीवादी निजाम ने उसे छीन लिया है और धीरे-धीरे छीन रहा है और अधिकांश असंगठित मजदूरों को आधुनिक गुलाम बना दिया है।
     मगर ये मार्क्स के विचार ही हैं जो एक दिन पूंजीवादी व्यवस्था शासन का अंत करेंगे, पूंजीवादी साम्राज्यवादी लूट, मुनाफाखोरी, अन्याय और शोषण को समाप्त करेंगे और एक ऐसी दुनिया बन कर रहेगी जिसमें सबको रोटी मिलेगी, सबको रोजी  मिलेगी, सबको काम मिलेगा, सबको घर मिलेगा, सबको सुरक्षा मिलेगी, सबको स्वच्छ पानी और हवा मिलेगी, सबको मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज की सुविधा मुहैया करायी जायेगी, शुद्ध पर्यावरण होगा, जिसमें देश के तमाम प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल पूरे देश की जनता के विकास के लिए किया जाएगा और जिसमें मजदूरों और किसानों की राजसत्ता और सरकार होगी और यह सरकार सारी जनता के कल्याण के लिए काम करेगी और एक शोषणविहीन और अन्यायविहीन सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करेगी।
     ऐसी जनकल्याणकारी व्यवस्था, मार्क्सवादी विचारों की दुनिया कायम होने पर ही बनायी जा सकती है। यहां पर आकर मार्क्स दुनिया के सबसे बड़े विचारक और दार्शनिक बनकर हमारे सामने आते हैं और वे अपने विचारों में आज भी जिंदा है। यह मार्क्स ही है जिन्होंने कहा था कि पूंजीवाद अपने आप में एक संकटग्रस्त व्यवस्था है, जो मानव श्रम का सबसे बड़ा अपहरण करती है, जो मानव को शोषण, अन्याय, हिंसा, भेदभाव, असमानता और असुरक्षा से मुक्ति नहीं दिला सकती। कितने कमल की बात है कि मार्क्स के विचार आज लगभग पौने दो सौ साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं, आज भी उनका कोई तोड़ नहीं है। आज हम देख रहे हैं कि जब तक मार्क्स के विचारों की दुनिया कायम नही हो जाती, तब तक दुनिया में अमन, न्याय, समता, समानता, जनतंत्र , गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैश्विक भाईचारा और सबका विकास और सबका कल्याण नही हो सकता है ।
      मार्क्स दुनिया के सबसे बड़े दार्शनिक बनकर हमारे सामने आते हैं जब वे समता, समानता, जनतंत्र और आदमी के साम्य यानी आदमी की बराबरी, समता, समानता  और भाईचारे की बात करते हैं। वे कहते हैं कि "इस दुनिया की अनेकों दार्शनिकों और विचारकों ने व्याख्या की है, मगर असली सवाल इस शोषणकारी दुनिया को बदलने का है।"
    कार्ल मार्क्स राज्य को एक हथियारबंद और जनविरोधी और पूंजीपतियों का हिंसक दस्ता मानते थे। वे कहते थे कि जनता को, समाज को पूंजीवादी राज्य कि नहीं, बल्कि जनता के जनवादी राज्य यानी किसानों मजदूरों के राज्य, सत्ता और सरकार की जरूरत है। उनका कहना था कि राज्य, पूंजीवादी लूट और मुनाफाखोरी को बढ़ाने वाला संगठन न होकर रह जाए, बल्कि वह जनता के लिए कल्याणकारी काम करे, जनता की समस्याओं का हल करे और जनता पर होने वाले पूंजीवादी और सामंती हमलों का दमन करे और इन हमलों से जनता के जनवादी अधिकारों की रक्षा करे।
     उन्होंने दर्शन की दरिद्रता की बात की है। उन्होंने दरिद्रता के समूल विनाश की बात की है। दुनिया के कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी और जरुरी कहीं जाने वाली ऐतिहासिक और क्रांतिकारी पुस्तक "कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो" में मार्क्स और ऐंगेल्स ने कहा है कि "ओ मजदूरों, तुम्हारे पैरों में जंजीरें बंधी हुई हैं, तुम्हारे पास अपनी जंजीरों के खोने के लिए कुछ भी नही है! दुनिया के मजदूरों एक हों।" इसी पुस्तक में कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिज्म के सिद्धांत पेश किए और दुनिया में सबसे पहले, सबको आधुनिक शिक्षा, सबको आधुनिक स्वास्थ्य, सबको काम, सबको घर, सबको रोजगार, सबको सुरक्षा और संपत्ति में सब का अधिकार की मांग की। इस छोटी सी पुस्तिका के आने के बाद, दुनिया में वैचारिक तहलका मच गया। यह विश्व प्रसिद्ध किताब आज भी दुनिया की तमाम वामपंथी ताकतों की सबसे महत्वपूर्ण किताब बनी हुई है। कितने कमाल की बात है कि मार्क्स के विचारों और इस किताब से प्रभावित होकर, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि "सभी दलितों, शोषितों और गरीबों को कार्ल मार्क्स और एंगेल्स की किताब "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" को जरूर पढ़ना चाहिए।"
      हमें यहीं पर एक बात और देखने को मिलती है और वह यह है कि मार्क्स को पूरी दुनिया का लुटेरा पूंजीपति वर्ग आज भी सबसे ज्यादा गाली गलौज करता है, उनसे सबसे ज्यादा नफरत करता है, उनके लिए सबसे ज्यादा अपशब्द प्रयोग करता है और सबसे ज्यादा गिरी हुई नजर से देखता है, क्योंकि मार्क्स वे पहले दार्शनिक और क्रांतिकारी लेखक थे जिन्होंने मजदूरों का शोषण करने वाले पूंजीवाद के शोषण और अन्याय की पोल खोल दी थी और इस शोषणकारी व्यवस्था को बदल कर, सामाजिक, राजनीतिक क्रांति करके, इसके स्थान पर किसानों मजदूरों की वैज्ञानिक समाजवादी सत्ता और सरकार कायम करने की बात कही थी। हकीकत यह है कि मार्क्स का दुनिया भर में कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।
    मार्क्स और एंगेल्स का दृष्टिकोण कितना वैज्ञानिक था कि 1917 में रूस में मार्क्सवादी सिद्धांतों को धरती पर उतारा गया और किसानों और मजदूरों की, महान लेनिन के नेतृत्व में सर्वहारा क्रांति की गई और उसके बाद दुनिया के कई देशों में मार्क्सवादी लेनिनवादी क्रांतियां हुईं और जनता, किसानों और मजदूरों की जनकल्याणकारी सरकार और शासन कायम हुए और उनकी बहुत सारी कठिनाइयों का यानी बुनियादी समस्याओं का समाधान हुआ।
      मार्क्स का जीवन और दर्शन एक आदमी के बिना अधूरा ही रह जाता है और वे हैं फ्रेड्रिक ऐंगेल्स, जो उनके सह लेखक और आजीवन दुनिया के सबसे दोस्त रहे थे। मार्क्सवाद ऐंगेल्स के बिना पूरा नही हो सकता। मार्क्स ने खुद ही कहा था कि "अगर उन्हें और उनके परिवार को, एंगेल्स की निस्वार्थ आर्थिक सहायता नहीं मिलती, तो वे अपने लेखन को जारी नहीं रख सकते थे।" हम कह सकते हैं कि यदि ऐंगेल्स न होते तो मार्क्सवाद भी न होता। ऐंगेल्स ने सदा ही अपने से पहले, मार्क्स के परिवार की आर्थिक और मनोवैज्ञानिक और लेखकीय मदद की। अपने परिवार के प्रति एंगेल्स की मदद को देखते हुए मार्क्स ने खुद कहा था कि "अगर एंगेल्स की सहायता न होती, तो मैं अपने कार्य को आगे जारी नहीं रख सकता था।"
       मार्क्स की पत्नी जैनी मार्क्स के बिना भी मार्क्स की दुनिया अधूरी ही कही जायेगी क्योंकि यह जैनी ही थीं जो मार्क्स की विपन्नता और विपरीत परिस्थितियों में मार्क्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडी रहीं, बिना दवाईयों के अपने तीन बच्चों,,,, दो लडकों और एक लडकी,,,, को मौत के मुंह में समाते देखती रहीं, मगर मार्क्स के क्रांतिकारी, मुक्तिकारी और ऐतिहासिक काम में रोडा न अटकाया, बल्कि जैनी मार्क्स ने कई छोटे-छोटे काम करके परिवार को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाने में मदद की।
       मार्क्स के क्रांतिकारी समाजवादी विचारों की सर्वव्यापी विराटता देखिये कि आज दुनिया का कोई कौना नही है, दुनिया का कोई देश नही है, जहां मार्क्स के विचारों ने दस्तक न दी हो। दुनिया का कौनसा शाषकवर्ग है जो पिछले डेढ सौ सालों में प्रभावित न हुआ हो और दुनिया का कौनसा देश है जहां कम्युनिस्ट पार्टियां, मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, महिलाओं की, आदिवासियों की, मुक्ति की लड़ाई न लडी जा रही हों, जहां पूंजीपतियों और मेहनतकशों का अविराम संघर्ष जारी न हो? यही मार्क्स की विराटता और महानता है कि मार्क्स आज भी दुनिया के सबसे बड़े क्रांतिकारी वैज्ञानिक समाजवादी विचारक, दार्शनिक और लेखक बने हुए हैं। मार्क्स के साथ साथ हम ऐंगेल्स, लेनिन और उनकी महान पत्नी जैनी मार्क्स के क्रांतिकारी योगदान को नही भूल सकते हैं।
     ये महान लेनिन ही थे कि जिन्होंने  कार्ल मार्क्स की क्रांतिकारी वैज्ञानिक समाजवादी विचारों को आगे बढ़ाया और 1917 में मार्क्स के विचारों को रुस में धरती पर उतारा, उनमें कुछ वृद्धि की और दुनिया में रुस में सबसे पहली वैज्ञानिक समाजवादी क्रांति की और दुनिया में एक नए युग की यानी वैज्ञानिक समाजवादी युग की, शुरुआत की। रुसी क्रांति के बाद कृषि की जमीन का, उत्पादन के साधनों का, विनिमय और वितरण के साधनों का राष्ट्रीयकरण और सामाजिकरण किया गया। सत्ता का प्रयोग किसान, मजदूर और मेहनतकशों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया और मानव इतिहास में, किसानों मजदूरों को सबसे पहले अपना असली जीवन निर्माता बनाया गया। रुस में स्टालिन के समय तक, सत्ता का प्रयोग कभी भी अपने हितों को या अपने परिवार के हितों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया गया। यह मार्क्सवादी विचारधारा की ही सबसे बड़ी देन थी।
    इस वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था की मजदूरों और किसानों की सत्ता और सरकार ने पूरी दुनिया को दिखाया और सिखाया कि कैसे सत्ता का इस्तेमाल, एक आदमी या परिवार का घर भरने के लिए नहीं, बल्कि समस्त जनता के कल्याण के लिए किया जा सकता है। यह रूसी क्रांति ही थी जिसने दुनिया में पहली दफ़ा मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों को धरती पर उतारा, जिसके बाद दुनिया में एक के बाद एक, तिहाई देशों में क्रांतियां हुई और किसान-मजदूर शासन में बैठे और उनका राज्य कायम हुआ और वहां उन्होंने जनता के कल्याण के लिए काम किया गया। यही मार्क्स की सबसे बड़ी विशेषता है कि उन्होंने जो कहा था, वह काल्पनिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक और सांसारिक था। उसे मजदूर और किसान वर्ग के लोगों यानी मेहनतकशों ने धरती पर उतारा और क्रांतियां कीं और हजारों साल से चले आ रहे अन्याय, शोषण, जुल्म, अन्याय, भेदभाव, गैर बराबरी और अमानवीयता को खत्म किया।
       कार्ल मार्क्स के कुछ सर्वश्रेष्ठ विचारों की एक झलक इस प्रकार है,,,,,,
,,,, दुनिया भर के मजदूरों एक हो। 
,,,, क्रांतियां इतिहास की इंजन होती हैं। 
,,,,इस दुनिया की व्याख्या बहुत से दार्शनिकों ने की है पर असली सवाल इसे बदलने का है।
,,,, अमीर गरीब के लिए कुछ भी कर सकते हैं, मगर वे उनके ऊपर से हट नहीं सकते।
,,,, मजदूरों के पास खोने के लिए केवल बेडियां हैं और पाने के लिए पूरी दुनिया।
,,,, प्रत्येक को उसकी क्षमता के हिसाब से,
 प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार।
,,,,प्रत्येक को उसकी क्षमता के हिसाब से, 
प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार। 
,,,,पूंजी मृत श्रम है जो पिशाच की तरह है जो केवल श्रम चूसकर ही जिंदा रहता है और जितना अधिक जीता है, उतना ही श्रम चूसता जाता है।
,,,, पूंजीवादी सरकार पूंजीपतियों की कार्यकारिणी है, पूंजीवादी सरकार को समाप्त करके उसके स्थान पर किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार बना कर ही, जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
,,,, इस समाज में आदमी के पास एक ही विकल्प है या तो वह शिकार बने या शिकारी। पूंजीवादी समाज की आलोचना के लिए समाजवादी होना जरूरी नहीं है, केवल एक इंसान होना ही काफी है।
,,,, पूंजीवादी व्यवस्था का तख्ता उलट कर उसके स्थान पर वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था कायम करके ही, पूरी जनता को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पूर्ण विकास और उनकी सारी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
       कार्ल मार्क्स के ये विचार आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रासंगिक बने हुए हैं। ये विचार बता रहे हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था एक संकटग्रस्त, अन्यायी, शोषणकारी, युध्दोन्मादी, वैश्विक प्रभुत्व कायम करने वाली, जनता को बांटकर राशि
ने वाली और जनता की एकता तोड़ने वाली व्यवस्था है, वह जनता के बुनियादी अधिकार उसे मोहिया नहीं करा सकती। वह दुनिया के संसाधनों पर कब्जा तो कर सकती है मगर जनता को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भाईचारा, समुचित विकास, न्याय और शांति उपलब्ध नहीं कर सकती। अपने इन्हीं क्रांतिकारी विचारों की बदौलत ही कार्ल मार्क्स आज भी दुनिया के सबसे बड़े क्रांतिकारी विचारक और दार्शनिक बने हुए हैं। कार्ल मार्क्स को याद करते हुए हम तो यही कहेंगे,,,,,

सारे ताने-बाने को बदलो 
खुद भी बदलने की बात करो, 
हारे थके आधे अधूरे ही नहीं 
पूरे इंकलाब की बात करो।

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