यूपी में सत्ता परिवर्तन की पटकथा: बंगाल के संकेत से अखिलेश की नई सियासी बिसात
रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी
ममता की हार से सबक, व्यापक गठबंधन ही विकल्प; एनडीए बनाम इंडिया सीधी लड़ाई बना सकती है गेमचेंजर
लखनऊ: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हालिया चुनावी हार ने विपक्षी दलों को साफ संदेश दिया है कि बिखरा हुआ विपक्ष सत्ता तक पहुंचने में सबसे बड़ी बाधा बन सकता है। इसी के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर व्यापक गठबंधन की रणनीति पर गंभीरता से विचार करते नजर आ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी अब केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और आजाद समाज पार्टी तक सीमित न रहकर छोटे-छोटे क्षेत्रीय और जातीय प्रभाव वाले दलों को साथ जोड़कर बड़ा सामाजिक समीकरण बनाने की दिशा में काम कर सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में छोटे दलों की भूमिका भले सीटों के लिहाज से सीमित हो, लेकिन उनका वोट प्रतिशत कई सीटों पर जीत-हार तय करता है। ऐसे में राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (कमेरावादी), जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट), पीस पार्टी और निषाद पार्टी जैसे दल संभावित सहयोगी हो सकते हैं। इनका संयुक्त वोट शेयर भले सीमित दिखे, लेकिन 20 से 30 सीटों पर यह निर्णायक साबित हो सकता है।
वोट प्रतिशत के गणित पर नजर डालें तो 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि सपा गठबंधन लगभग 32 प्रतिशत पर रहा। ऐसे में अगर सपा मुस्लिम, यादव, जाट, कुर्मी, राजभर और निषाद जैसे सामाजिक समूहों के साथ दलित वोट का एक हिस्सा जोड़ने में सफल होती है, तो उसका वोट शेयर 38 से 42 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो सीधी टक्कर में सत्ताधारी दल को चुनौती देने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
इस पूरे समीकरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक और बसपा का दलित आधार अगर किसी रूप में सपा के साथ आता है, तो चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। हालांकि बसपा के रुख को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
प्रदेश में लगभग 19 प्रतिशत मुस्लिम वोट भी चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाता है। पिछले चुनावों में कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटों के बिखराव से भाजपा को लाभ मिला था। ऐसे में सपा की कोशिश होगी कि छोटे मुस्लिम दलों को साथ लाकर वोटों का बंटवारा रोका जाए और एकतरफा ट्रांसफर सुनिश्चित किया जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि उत्तर प्रदेश में मुकाबला त्रिकोणीय होने के बजाय सीधे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाम इंडिया गठबंधन के रूप में होता है, तो यह सत्ता परिवर्तन की दिशा में सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है। इससे वोटों का बिखराव कम होगा और सत्ता विरोधी मत एकजुट होकर निर्णायक असर डाल सकते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बंगाल के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मजबूत संगठन वाली पार्टी के सामने बिखरा विपक्ष टिक नहीं पाता। ऐसे में यूपी में भी “एकजुट विपक्ष बनाम बिखरा विपक्ष” का फार्मूला ही निर्णायक होगा।
अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव इस संभावित महागठबंधन को जमीन पर कितना प्रभावी ढंग से उतार पाते हैं। सीट बंटवारे, नेतृत्व संतुलन और वोट ट्रांसफर की क्षमता ही तय करेगी कि 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन संभव हो पाएगा या फिर बिखरे विपक्ष और मुस्लिम वोटो का बटवारा भाजपा को फिर फायदा पहुंचाएगा।
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