108 साल बाद फिर उठी अगड़े-पिछड़ों की बहस! पूर्व विधायक सुल्तान बेग के बयान से मुस्लिम समाज में मचा राजनीतिक भूचाल
रिपोर्ट:मुस्तकीम मंसूरी
भोजीपुरा में मंच से गिनाईं बिरादरियों की आबादी, कई पसमांदा समुदायों का जिक्र न होने पर उठे सवाल; राजनीतिक गलियारों में तेज हुई चर्चा
"बिरादरी की गिनती या राजनीतिक रणनीति? सुल्तान बेग के बयान से उठे कई बड़े सवाल
बरेली। भोजीपुरा विधानसभा क्षेत्र में पूर्व विधायक सुल्तान बेग का एक भाषण इन दिनों सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। उनके भाषण का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह मंच से विभिन्न मुस्लिम बिरादरियों की आबादी का आंकड़ा सार्वजनिक रूप से बताते दिखाई दे रहे हैं।
पूर्व विधायक ने अपने संबोधन में कहा कि भोजीपुरा विधानसभा क्षेत्र में शेख, सैय्यद, मुगल और पठान समुदाय की संयुक्त संख्या लगभग 90 हजार है।
इसके अलावा मेवाती समाज की संख्या 35 से 40 हजार, अल्वी समाज की संख्या 26 हजार, मंसूरी समाज की संख्या 22 हजार तथा अंसारी समाज की संख्या भी करीब 22 हजार बताई।
हालांकि, उनके इस भाषण के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब उन्होंने कुछ बिरादरियों की संख्या का विस्तार से उल्लेख किया, तब सलमानी, सैफी, अब्बासी, कुरैशी, इदरीसी, सिद्दीकी समेत अन्य पसमांदा समुदायों की आबादी का जिक्र क्यों नहीं किया। यही सवाल अब भोजीपुरा विधानसभा क्षेत्र से निकलकर पूरे बरेली जिले में चर्चा का विषय बन चुका है।
'शेख, सैय्यद, मुगल और पठान की अलग-अलग संख्या क्यों नहीं बताई?'
सोशल मीडिया पर कई लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब अंसारी, मंसूरी, मेवाती और अल्वी समाज की अलग-अलग संख्या बताई गई, तब शेख, सैय्यद, मुगल और पठान समुदायों की अलग-अलग आबादी का विवरण क्यों नहीं दिया गया। आलोचकों का कहना है कि यदि जातिगत आंकड़ों की चर्चा की जा रही थी तो सभी समुदायों के बारे में समान रूप से जानकारी दी जानी चाहिए थी।
मुस्लिम राजनीति में फिर जिंदा हुई अगड़े-पिछड़ों की बहस
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि या राजनीतिक नेता को क्षेत्र की जनता को अगड़े और पिछड़े के चश्मे से देखने से बचना चाहिए। उनका तर्क है कि इस प्रकार के भाषण समाज में अनावश्यक विभाजन और असहजता का माहौल पैदा कर सकते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार पिछले कई वर्षों से मुस्लिम समाज के भीतर शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा बढ़ी थी, जिससे जातिगत बहस अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गई थी। लेकिन सुल्तान बेग के हालिया भाषण ने एक बार फिर पसमांदा और अगड़े वर्गों के बीच प्रतिनिधित्व तथा हिस्सेदारी की बहस को हवा दे दी है।
कैंट विधानसभा को लेकर भी चर्चाएं तेज
राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि बरेली की कैंट विधानसभा में भी एक ऐसे संभावित प्रत्याशी की चुनावी तैयारी चल रही है, जो सार्वजनिक मंचों पर पसमांदा समाज के लिए बराबरी और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन निजी बैठकों में उनके विचार अलग बताए जाते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
108 साल पुरानी बहस फिर क्यों लौटी?
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि मुस्लिम समाज के भीतर बिरादरी आधारित राजनीतिक चर्चा कोई नई बात नहीं है। बीते एक शताब्दी से अधिक समय में समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में किन वर्गों की भागीदारी कितनी है। लेकिन आधुनिक दौर में पढ़े-लिखे और जागरूक पसमांदा समाज के लोगों ने इस बहस को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था। अब पूर्व विधायक के बयान के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।
शहज़िल इस्लाम की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषय
इस पूरे मामले में भोजीपुरा से वर्तमान विधायक शहज़िल इस्लाम की ओर से अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक हलकों में उनकी चुप्पी को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कई लोग मानते हैं कि क्षेत्र के मौजूदा जनप्रतिनिधि होने के नाते उनकी प्रतिक्रिया इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
राजनीतिक संदेश क्या है?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आगामी चुनावों को देखते हुए बिरादरी आधारित समीकरणों पर चर्चा बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीति विकास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी के मुद्दों पर केंद्रित रहेगी या फिर एक बार फिर जातीय और बिरादरी आधारित गणित चुनावी विमर्श पर हावी होगा।
फिलहाल सुल्तान बेग के बयान ने भोजीपुरा ही नहीं बल्कि पूरे बरेली के मुस्लिम समाज में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसके राजनीतिक प्रभाव आने वाले दिनों में और स्पष्ट हो सकते हैं।
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