मिशन 2027 के सामने सबसे बड़ा सवाल: क्या जमीनी संघर्ष की कमी सपा की सत्ता वापसी की राह रोक देगी?


रिपोर्ट:मुस्तकीम मंसूरी 

मुद्दे तो मिले, लेकिन आंदोलन नहीं; क्या यही सपा की सबसे बड़ी कमजोरी है?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं होती, बल्कि जनता के मुद्दों को लेकर सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष करना भी उसकी जिम्मेदारी होती है। वर्ष 2017 में सत्ता से बाहर होने के बाद से लेकर 2026 तक समाजवादी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने ऐसे अनेक मुद्दे आए, जिन पर व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया जा सकता था।
कानून व्यवस्था पर लगातार उठते सवाल, बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार के आरोप, किसानों की समस्याएं, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं, अल्पसंख्यकों के साथ कथित भेदभाव और उत्पीड़न जैसे मुद्दे प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहे। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इन मुद्दों पर समाजवादी पार्टी ने उतनी आक्रामक और व्यापक जमीनी लड़ाई नहीं लड़ी, जितनी एक मजबूत विपक्ष से अपेक्षित थी।
पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के दौर में समाजवादी राजनीति की पहचान संघर्ष और आंदोलन हुआ करती थी। चाहे किसानों का सवाल हो, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात हो या सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, नेताजी अक्सर कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर दिखाई देते थे। यही कारण था कि समाजवादी आंदोलन केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा बल्कि एक जनआंदोलन के रूप में स्थापित हुआ।
इसके विपरीत अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने डिजिटल और मीडिया आधारित राजनीति पर अधिक जोर दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया अभियान और सरकार पर तीखे राजनीतिक हमले लगातार देखने को मिले, लेकिन कई अवसरों पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच यह भावना भी दिखाई दी कि जिन मुद्दों पर जनता सड़कों पर संघर्ष देखना चाहती थी, वहां पार्टी का आंदोलन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सका।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि चुनाव केवल नाराजगी के सहारे नहीं जीते जाते। जनता यह भी देखती है कि विपक्ष उसके संघर्ष में कितना साथ खड़ा रहा। यदि किसी मुद्दे पर जनता सड़क पर है और विपक्ष केवल सोशल मीडिया तक सीमित दिखाई देता है, तो उसका राजनीतिक लाभ सीमित हो जाता है।
मिशन 2027 की दृष्टि से यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि समाजवादी पार्टी को सत्ता में वापसी करनी है तो उसे केवल सरकार की आलोचना करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि जनता की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी की छवि को फिर से मजबूत करना होगा। बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करना, युवाओं, किसानों, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर लगातार जनसंपर्क अभियान चलाना और बड़े पैमाने पर जनआंदोलन खड़ा करना सपा के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
राजनीतिक इतिहास बताता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का रास्ता केवल सोशल मीडिया के ट्रेंड से नहीं, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचने वाले संगठन और निरंतर जनसंघर्ष से होकर गुजरता है। ऐसे में 2027 का चुनाव केवल भाजपा और सपा के बीच मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या अखिलेश यादव अपनी राजनीति को डिजिटल दायरे से निकालकर फिर से जमीनी संघर्ष की दिशा में ले जा पाते हैं या नहीं।
यदि सपा आने वाले महीनों में जनता के मुद्दों पर निर्णायक और व्यापक आंदोलन खड़ा करने में सफल रहती है तो सत्ता वापसी की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। लेकिन यदि विपक्ष की भूमिका मुख्य रूप से सोशल मीडिया, बयानबाजी और चुनावी सभाओं तक सीमित रही, तो 2022 की तरह 2027 में भी सत्ता का रास्ता कठिन साबित हो सकता है।

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