महापुरुषों की मूर्तियों पर माल्यार्पण और नमन इस्लामी तालीमात के खिलाफ़ : डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी



रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 
 
धर्मनिरपेक्ष दिखने की होड़ में मुसलमानों के बीच बढ़ रहा एक चिंताजनक चलन, समाज में जा रहा गलत संदेश

बरेली। प्रख्यात इस्लामी चिंतक एवं समाजसेवी डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी ने कहा है कि आजकल मुस्लिम समाज के कुछ राजनीतिक, सामाजिक और पेशेवर वर्गों में महापुरुषों की मूर्तियों और तस्वीरों पर फूल-माला चढ़ाने, हाथ जोड़कर नमन करने तथा सिर झुकाकर श्रद्धांजलि देने का चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है, जो इस्लामी शिक्षाओं की दृष्टि से गंभीर चिंतन का विषय है।
डॉ. अंसारी ने कहा कि इस्लाम का सबसे बुनियादी सिद्धांत तौहीद है, जिसके अनुसार इबादत, बंदगी, झुकना और अंतिम दर्जे का सम्मान केवल अल्लाह तआला के लिए है। इस्लाम इंसानों की सेवाओं और योगदान को स्वीकार करने तथा उनके अच्छे कार्यों को याद रखने की शिक्षा देता है, लेकिन किसी मूर्ति, प्रतिमा या तस्वीर के सामने इस प्रकार की श्रद्धा प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं देता जो पूजा-पद्धति या धार्मिक सम्मान का स्वरूप प्रतीत हो।
उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी या सर्वधर्म समभाव का समर्थक दिखाने के लिए सार्वजनिक मंचों पर महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करते हैं, हाथ जोड़ते हैं और सिर झुकाकर नमन करते हैं। यह प्रवृत्ति केवल नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों, व्यापारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी दिखाई देने लगी है।
डॉ. अंसारी ने कहा कि किसी भी महापुरुष के सामाजिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक योगदान का सम्मान करना अलग बात है, लेकिन सम्मान व्यक्त करने के ऐसे तरीके अपनाना जो इस्लामी पहचान और तौहीद की भावना के विपरीत समझे जाएं, एक मुसलमान को शोभा नहीं देता।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यों से मुस्लिम समाज, विशेषकर नई पीढ़ी के बीच गलत संदेश जाता है। जब प्रभावशाली और प्रतिष्ठित लोग सार्वजनिक रूप से ऐसे कार्य करते हैं तो आम मुसलमानों में भ्रम पैदा होता है कि शायद इस्लाम में इसकी अनुमति है, जबकि इस्लामी शिक्षाएं मुसलमानों को अपने आचरण में तौहीद और शरीअत की सीमाओं का विशेष ध्यान रखने की हिदायत देती हैं।
डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी ने कहा कि मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने धर्म की मूल शिक्षाओं को समझें और किसी भी राजनीतिक, सामाजिक या व्यक्तिगत लाभ के लिए ऐसे कार्यों से बचें जो इस्लामी पहचान को कमजोर करें या समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करें। उन्होंने कहा कि किसी महापुरुष के योगदान को याद करने, उनके विचारों पर चर्चा करने और उनके अच्छे कार्यों से प्रेरणा लेने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सम्मान का तरीका इस्लामी उसूलों के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहा कि वे कुरआन और सुन्नत की शिक्षाओं को अपने व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन में प्राथमिकता दें और ऐसे किसी भी चलन से दूर रहें जो तौहीद के संदेश को धूमिल करने का कारण बन सकता हो।

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