डॉक्टर, वकील और शिक्षक क्यों नहीं बन पाते आदर्श जनप्रतिनिधि?


रिपोर्ट:मुस्तकीम मंसूरी 

शिक्षा और पेशेवर अनुभव के बावजूद जनता की उम्मीदों पर खरे न उतरने की बड़ी वजहें

लखनऊ। लोकतंत्र में यह आम धारणा रही है कि डॉक्टर, वकील और शिक्षक जैसे पढ़े-लिखे एवं समाज से सीधे जुड़े पेशों के लोग राजनीति में आएंगे तो जनता को बेहतर नेतृत्व मिलेगा। डॉक्टर स्वास्थ्य व्यवस्था की समस्याओं को समझते हैं, वकील कानून और संविधान की जानकारी रखते हैं तथा शिक्षक समाज और शिक्षा की बुनियादी चुनौतियों से परिचित होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब यही लोग सांसद या विधायक बनते हैं तो अक्सर जनता की उम्मीदों पर खरे क्यों नहीं उतर पाते?
देश और प्रदेश की राजनीति में अनेक डॉक्टर, वकील और शिक्षक सांसद-विधायक बने, लेकिन जनता के बीच उनकी पहचान अक्सर विकास कार्यों के बजाय राजनीतिक बयानबाजी, दलगत संघर्ष और चुनावी वादों तक सीमित रह गई। 
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी व्यक्ति का अच्छा डॉक्टर, वकील या शिक्षक होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह सफल जनप्रतिनिधि भी साबित होगा। चिकित्सा, कानून और शिक्षा का क्षेत्र व्यक्तिगत दक्षता पर आधारित होता है, जबकि राजनीति में संगठन क्षमता, जनसंपर्क, प्रशासनिक समझ और संसाधनों के प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
अक्सर देखा गया है कि पेशेवर लोग चुनाव जीतने के बाद भी अपने पुराने पेशे की सोच से बाहर नहीं निकल पाते और व्यापक जनसमस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे पाते।
चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधि जनता के बीच लगातार दिखाई देते हैं, लेकिन जीत के बाद कई नेता आम लोगों से दूरी बना लेते हैं। डॉक्टर, वकील और शिक्षक पृष्ठभूमि के कई नेताओं पर भी यही आरोप लगता है कि वे अपने क्षेत्र में नियमित संवाद और जनसुनवाई की व्यवस्था नहीं बना पाते।
जनता का मानना है कि चुनावी वादों के समय जो नेता गांव-गांव और गली-गली दिखाई देते हैं, वही जीतने के बाद जनता की पहुंच से दूर हो जाते हैं।
कई बार सांसद और विधायक व्यक्तिगत रूप से विकास कार्य करना चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की रणनीति, संगठनात्मक दबाव और सत्ता की प्राथमिकताएं उनके फैसलों को प्रभावित करती हैं।
ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने के बजाय पार्टी नेतृत्व की अपेक्षाओं को प्राथमिकता देने लगते हैं। परिणामस्वरूप जनता को लगता है कि उनका प्रतिनिधि उनकी आवाज़ नहीं बन पा रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि देश में राजनीति का बड़ा हिस्सा विकास योजनाओं से अधिक चुनावी गणित, जातीय समीकरणों और वोट बैंक की राजनीति पर केंद्रित हो गया है। ऐसे माहौल में पढ़े-लिखे और पेशेवर पृष्ठभूमि वाले नेता भी उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं।
विकास के दीर्घकालिक एजेंडे की जगह अगले चुनाव की तैयारी प्राथमिकता बन जाती है।
एक अन्य पहलू यह भी है कि जनता अपने सांसद और विधायक से हर समस्या के समाधान की उम्मीद करती है, जबकि कई मुद्दे प्रशासनिक, वित्तीय और नीतिगत सीमाओं से जुड़े होते हैं।
इसके बावजूद जनता यह मानती है कि यदि जनप्रतिनिधि ईमानदारी से प्रयास करे, नियमित संवाद बनाए रखे और समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाए तो सकारात्मक परिणाम संभव हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार सफल जनप्रतिनिधि बनने के लिए केवल उच्च शिक्षा या प्रतिष्ठित पेशा पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आवश्यक है-
जनता के बीच निरंतर मौजूदगी
समस्याओं की गहरी समझ
प्रशासनिक तंत्र पर पकड़
ईमानदार और पारदर्शी कार्यशैली
दलगत राजनीति से ऊपर उठकर क्षेत्रीय हितों की पैरवी
डॉक्टर, वकील और शिक्षक समाज के सम्मानित पेशे हैं, लेकिन राजनीति की सफलता केवल डिग्री या पेशे से तय नहीं होती। जनता उन प्रतिनिधियों को याद रखती है जो चुनाव जीतने के बाद भी उनके बीच बने रहते हैं, उनकी समस्याओं को अपनी समस्या समझते हैं और विकास को राजनीति से ऊपर रखते हैं।
लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि जनप्रतिनिधि अपने पेशे की पहचान से आगे बढ़कर जनता की उम्मीदों का प्रतिनिधि बन सके। जब तक राजनीति सेवा के बजाय सत्ता का माध्यम बनी रहेगी, तब तक डॉक्टर, वकील, शिक्षक या किसी भी पेशे से आए नेता जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाएंगे।

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