मुहर्रम हमें सब्र, कुर्बानी और हक़ पर डटे रहने का पैग़ाम देता है: डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी
मुहर्रम की अस्ल रूह को समझने और गैर-शरई रस्मों से बचने की ज़रूरत
रिपोर्ट। मुस्तकीम मंसूरी
बरेली। समाजसेवी और इस्लामी मामलों के जानकार डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी ने कहा कि मुहर्रमुल हराम इस्लामी साल का पहला महीना है और यह उन मुक़द्दस महीनों में शामिल है जिन्हें अल्लाह तआला ने ख़ुसूसी फ़ज़ीलत अता फ़रमाई है। मुहर्रम का मक़सद महज़ रस्मों की अदायगी नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी को कुरआन व सुन्नत के मुताबिक़ ढालना, इबादत में इज़ाफ़ा करना और हक़ व इंसाफ़ की राह पर क़ायम रहना है।
उन्होंने कहा कि यौमे आशूरा हमें हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की नजात और मैदान-ए-कर्बला में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) और उनके रुफ़क़ा की अज़ीम कुर्बानियों की याद दिलाता है। कर्बला का वाक़िआ पूरी इंसानियत के लिए सबक़ है कि ज़ुल्म और बातिल के सामने सर न झुकाया जाए, चाहे इसके लिए कितनी ही बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।
डॉ. अंसारी ने कहा कि मुहर्रम के महीने में मुसलमानों को नमाज़ की पाबंदी, तिलावत-ए-कुरआन, ज़िक्र-ओ-अज़कार, तौबा-ओ-इस्तिग़फ़ार और नफ़्ली रोज़ों का एहतिमाम करना चाहिए। ख़ास तौर पर 9 और 10 या 10 और 11 मुहर्रम के रोज़े रखना सुन्नत से साबित है और इसकी बड़ी फ़ज़ीलत बयान की गई है।
उन्होंने मुसलमानों से अपील करते हुए कहा कि मुहर्रम के नाम पर होने वाली उन तमाम रस्मों और कामों से इज्तिनाब किया जाए जिनकी शरीअत में कोई अस्ल नहीं है। ख़ुद को ज़ख़्मी करना, जिस्म से ख़ून बहाना, सीना-कोबी करना, दिखावे और फ़िज़ूलख़र्ची में पड़ना इस्लाम की तालीमात के ख़िलाफ़ है। इस्लाम अमन, एहतियात और इंसानी जान की हिफ़ाज़त का दर्स देता है।
डॉ. मोहम्मद ख़ालिक अंसारी ने कहा कि आज ज़रूरत इस बात की है कि हम मुहर्रम की अस्ल रूह को समझें और इमाम हुसैन (रज़ि.) की सीरत से सब्र, इस्तिक़ामत, अख़्लाक़, इंसाफ़ और दीन पर साबित-क़दमी का सबक़ हासिल करें। अगर हम कर्बला के पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में उतार लें तो समाज में अमन, भाईचारा और इंसाफ़ क़ायम हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मुहर्रम हमें यह पैग़ाम देता है कि मुसलमान हर दौर में हक़ का साथ दे, मज़लूम की हिमायत करे और अल्लाह की रज़ा को दुनिया की तमाम मफ़ादात पर मुक़द्दम रखे। यही मुहर्रम का अस्ल मक़सद और यही कर्बला का पैग़ाम है।
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